तस्वीर क्यों बदली?
पिछले फाइनेंशियल ईयर में अनसिक्योर्ड लेंडिंग पोर्टफोलियो, जैसे पर्सनल लोन और माइक्रोफाइनेंस, में एसेट क्वालिटी को लेकर आई दिक्कतों के बाद, भारतीय बैंकों ने अब अपना फोकस सुरक्षित (secured) यानी कोलैटरल (collateral) वाले लोन की ओर शिफ्ट कर दिया है। इसी वजह से गोल्ड लोन में जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है। दिसंबर 2025 में, गोल्ड ज्वैलरी के बदले दिए गए लोन 127.6% बढ़कर ₹3.82 ट्रिलियन पर पहुंच गए, जबकि इसी दौरान बैंकों का कुल क्रेडिट ग्रोथ सिर्फ 14.4% रहा। इस तेजी के पीछे एक और बड़ा कारण सोने की कीमतों में आई करीब 80% की सालाना बढ़ोतरी है, जिसने लेंडर्स के लिए कोलैटरल वैल्यू बढ़ा दी और ज्यादा लोन देना संभव बना दिया। इस बदलाव का नतीजा यह है कि अब बैंकों की गोल्ड लोन मार्केट में हिस्सेदारी 2020 के 30.6% से बढ़कर लगभग 50% हो गई है, जबकि एनबीएफसी (NBFCs) की हिस्सेदारी कम हुई है।
RBI का भरोसा और LTV बफर
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सीनियर ऑफिशियल्स, जैसे गवर्नर संजय मल्होत्रा और डिप्टी गवर्नर स्वामीनाथन जे., ने इस ग्रोथ को 'अपेक्षित' बताया है और कहा है कि 'चिंता की कोई बात नहीं है'। उनका भरोसा दो मुख्य बातों पर टिका है: पहला, लोन पोर्टफोलियो की ओवरऑल एसेट क्वालिटी का मजबूत होना और दूसरा, लेंडर्स द्वारा रखे जा रहे समझदारी भरे लोन-टू-वैल्यू (LTV) रेश्यो। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिस्टम-वाइड LTV 70% से नीचे बना हुआ है, जो कि 85% की अधिकतम सीमा के काफी अंदर है। यह कदम लेंडर्स को सोने की कीमतों में संभावित गिरावट के खिलाफ एक बड़ा बफर प्रदान करता है। खास तौर पर, ₹2.5 लाख तक के लोन के लिए टियर्ड (tiered) LTV स्ट्रक्चर छोटे बरोअर्स के लिए लोन की उपलब्धता को बढ़ाता है।
असली जोखिम कहां है?
हालांकि, जिस तेजी से यह ग्रोथ आई है, उसमें एक बड़ा हिस्सा प्रॉपर्टी की कीमतों में बढ़ोतरी का है, न कि सिर्फ बरोअर्स की संख्या या लोन की राशि में बढ़ोत्तरी का। ऐसे में, यह इनहेरेंट वोलेटिलिटी (inherent volatility) का जोखिम पैदा करता है। सोना पारंपरिक रूप से एक सेफ-हेवन एसेट (safe-haven asset) माना जाता है, लेकिन इसकी कीमत ग्लोबल इकोनॉमिक कंडीशन, जियोपॉलिटिकल इवेंट्स और करेंसी की चाल से तेजी से ऊपर-नीचे हो सकती है। ऐसे में, अगर कमोडिटी की कीमतों में बड़ी गिरावट आती है, तो यह मौजूदा LTV बफर की क्षमता को परख सकता है, खासकर तब जब बरोअर्स पहले से ही आर्थिक तंगी से गुजर रहे हों।
आगे क्या है उम्मीद?
सुरक्षित लेंडिंग की ओर यह शिफ्ट, अनसिक्योर्ड रिटेल पोर्टफोलियो में पहले आई दिक्कतों से मिले सबक का एक समझदारी भरा जवाब है। RBI की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट (Financial Stability Report) ने भी दिखाया है कि अनसिक्योर्ड रिटेल लेंडिंग, खासकर प्राइवेट सेक्टर बैंकों में, ज्यादा स्लिपेज (slippages) और राइट-ऑफ (write-offs) का गवाह रही है, जो रिटेल एनपीए (NPAs) का एक बड़ा हिस्सा थे। फिलहाल, गोल्ड लोन सेगमेंट के लिए नज़रिया मजबूत दिख रहा है, क्योंकि क्रेडिट की डिमांड बनी हुई है और 2026 तक गोल्ड की कीमतों के लिए भी अनुमान पॉजिटिव हैं। फिर भी, मार्केट को इसके पीछे के ड्राइविंग फैक्टर्स पर नज़र रखनी होगी। हालिया रिपोर्ट्स कुछ इलाकों में डिपॉजिट और क्रेडिट की कंसंट्रेशन, और अनसिक्योर्ड लेंडिंग के धीरे-धीरे बढ़ने जैसी मैक्रो-प्रूडेंशियल कंसिडरेशन्स (macro-prudential considerations) की ओर इशारा करती हैं। इसलिए, गोल्ड लोन सेगमेंट की लॉन्ग-टर्म स्टेबिलिटी सिर्फ कमोडिटी की कीमतों पर ही नहीं, बल्कि बरोअर्स की रीपेमेंट कैपेसिटी और रेगुलेटरी ओवरसाइट (regulatory oversight) पर भी निर्भर करेगी।