भारत का गोल्ड लोन सेक्टर फाइनेंशियल ईयर 2026 में **45%** की रफ्तार से बढ़ा है, जो बैंकिंग क्रेडिट की कुल **16.7%** की ग्रोथ से कहीं ज्यादा है। संगठित क्षेत्र में ग्राहकों की बढ़ती दिलचस्पी और गोल्ड-बैक्ड फाइनेंसिंग की लोकप्रियता निवेशकों के लिए बड़े अवसर और जोखिम दोनों लेकर आई है।
गोल्ड लोन सेक्टर में इस समय तेजी की लहर है। फाइनेंशियल ईयर 2026 तक यह मार्केट ₹18.6 लाख करोड़ के आंकड़े को छू चुका है। यह ग्रोथ बैंकिंग सिस्टम की औसत ग्रोथ रेट से करीब 2.7 गुना ज्यादा है, जो दर्शाता है कि लोग अब अपनी लिक्विडिटी जरूरतों के लिए सोने को गिरवी रखने में ज्यादा सहज हैं।
क्यों बढ़ रहा है यह बाजार?
इस उछाल के पीछे सबसे बड़ी वजह सोने की कीमतों में आया 50% का उछाल है। जैसे-जैसे सोने की वैल्यू बढ़ी है, कर्ज लेने वालों को बड़ी लोन राशि मिल रही है। मार्केट में बैंकों का दबदबा कायम है, जिनके पास कुल मार्केट शेयर का 75% हिस्सा है, जबकि NBFCs का हिस्सा 12% है। एक सकारात्मक संकेत यह है कि संगठित कंपनियां अब अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर से 210 बेसिस पॉइंट्स का मार्केट शेयर छीनने में सफल रही हैं।
बदलता हुआ पोर्टफोलियो और को-लेंडिंग मॉडल
पहले गोल्ड लोन पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा सिर्फ खेती (Agriculture) से जुड़ा होता था, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। रिटेल गोल्ड लोन का हिस्सा FY24 के 15% से बढ़कर अब कुल एक्सपोजर का एक-तिहाई यानी 33% हो गया है। इसे सपोर्ट करने के लिए बैंक और NBFCs अब 'को-लेंडिंग' मॉडल अपना रहे हैं, जिससे कम लागत पर फंड्स की उपलब्धता आसान हो गई है।
निवेश के जोखिम और सावधानियां
निवेशकों को सतर्क रहने की भी जरूरत है। फंडिंग की लागत बढ़ने और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण बैंकों के मार्जिन पर दबाव दिख सकता है। इसके अलावा, यदि सोने की कीमतों में वैश्विक स्तर पर गिरावट आती है, तो लोन-टू-वैल्यू (LTV) रेशियो पर असर पड़ सकता है। इसी जोखिम को देखते हुए अधिकतर बड़े संस्थानों ने LTV को 80% की सीमा पर सीमित रखा है। भविष्य में कंपनियों के लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो पर नजर रखना निवेशकों के लिए काफी अहम होगा।
