आधी आबादी का आर्थिक योगदान क्यों है कम?
यह एक बड़ा सवाल है कि आधी आबादी होने के बावजूद भारतीय महिलाएं देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में सिर्फ 18.6% का ही योगदान क्यों दे पाती हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि महिला उद्यमियों को औपचारिक वित्तीय संस्थाओं से लोन मिलने में गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ता है। आंकड़े बताते हैं कि महिला-नेतृत्व वाले माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) में से 7% से भी कम को औपचारिक क्रेडिट मिल पाता है। इसके चलते लगभग 90% महिलाएं अनौपचारिक कर्ज के जाल में फंस जाती हैं, जो उनके विकास और नवाचार (innovation) की क्षमता को सीमित कर देता है।
'ब्लेंडेड फाइनेंस': जोखिम कम करने का मास्टरस्ट्रोक
इस वित्तीय खाई को पाटने के लिए 'ब्लेंडेड फाइनेंस' (Blended Finance) एक शक्तिशाली समाधान के रूप में उभरा है। यह पब्लिक, परोपकारी (philanthropic) और प्राइवेट पूंजी को मिलाकर ऐसे निवेश के अवसरों को सुरक्षित बनाता है, जिन्हें पारंपरिक बैंक जोखिम भरा मानते हैं। इसके लिए रिटर्नएबल ग्रांट (returnable grants), फर्स्ट-लॉस डिफॉल्ट गारंटी (first-loss default guarantees) और क्रेडिट सबवेंशन स्कीम (credit subvention schemes) जैसे उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है। ये तरीके प्राइवेट निवेशकों के संभावित नुकसान को कम करते हैं, जिससे महिलाओं के लिए बड़े और स्थायी फाइनेंसिंग के रास्ते खुलते हैं, भले ही उनके पास पारंपरिक गारंटी या क्रेडिट हिस्ट्री न हो। उदाहरण के लिए, वी-फाई (We-Fi) पहल ने 'ब्लेंडेड फाइनेंस' के इस्तेमाल से लगभग $2 बिलियन बैंक ऋण को महिला-स्वामित्व वाले व्यवसायों तक पहुँचाया है। कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) का पैसा अब सिर्फ चैरिटी नहीं, बल्कि वित्तीय समावेशन (financial inclusion) को बढ़ाने का एक रणनीतिक जरिया बन गया है।
क्यों है यह इतना जरूरी?
भारत की महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) चिंताजनक रूप से कम रही है, जो 2000 के दशक की शुरुआत में 30% से घटकर 2017 में 23% तक आ गई थी, हालांकि हालिया रिपोर्टों के अनुसार 2022-23 में यह 37% या उससे अधिक तक पहुँच सकती है। यह स्थिति तब है जब महिलाएं पारंपरिक रूप से सेवाओं (services) में अधिक रोजगार पाती हैं। सीमित संपत्ति का मालिकाना हक, सुरक्षा और सामाजिक मानदंडों के कारण आवागमन में बाधाएं, और अवैतनिक देखभाल कार्य (unpaid care work) का बोझ, महिलाओं की आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी को काफी कम कर देता है। हालाँकि 78% भारतीय महिलाओं के बैंक खाते हैं, लेकिन सक्रिय उपयोग केवल 13% तक ही सीमित है। चौंकाने वाली बात यह है कि जब महिलाओं को औपचारिक वित्तीय साधनों तक पहुंच मिलती है, तो वे पुरुषों की तुलना में बेहतर बचत और पुनर्भुगतान अनुशासन (repayment discipline) दिखाती हैं। ऐसे में, कॉर्पोरेट इंडिया के बढ़ते CSR खर्च (FY 2022-23 में ₹29,987 करोड़ से अधिक) का एक हिस्सा 'ब्लेंडेड फाइनेंस' में लगाकर महिला उद्यमियों की मदद की जा सकती है। वैश्विक अध्ययनों के अनुसार, यदि लैंगिक समानता को बढ़ावा दिया जाए तो भारत की GDP में 27% तक की वृद्धि हो सकती है, जिससे 2025 तक $2.9 ट्रिलियन का अतिरिक्त लाभ हो सकता है।
राह में अभी भी हैं रोड़े
'ब्लेंडेड फाइनेंस' के वादे के बावजूद, रास्ते में कई बड़ी संरचनात्मक बाधाएं मौजूद हैं। विश्व बैंक (World Bank) के अनुसार, महिलाओं के आर्थिक समानता को बढ़ावा देने वाले कानून अक्सर आधे-अधूरे ही लागू होते हैं। भारत में, महिला उद्यमियों को 'मिसिंग मिडल' (missing middle) फाइनेंसिंग गैप का सामना करना पड़ता है, जहाँ उनकी ज़रूरतें माइक्रोफाइनेंस से ज़्यादा होती हैं लेकिन कमर्शियल बैंकों की सीमा तक नहीं पहुँच पातीं। इसके अलावा, अनौपचारिक क्षेत्र का वर्चस्व, जहाँ महिलाओं को कम वेतन और सुरक्षा मिलती है, एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। वित्तीय संस्थान महिला-नेतृत्व वाले MSMEs को अक्सर उच्च जोखिम वाला मानते हैं, भले ही महिलाओं के ऋणों पर नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) की दरें कम हों। प्रभावी हस्तक्षेप के लिए सिर्फ पूंजी से ज़्यादा, सामाजिक मानदंडों को बदलने, वित्तीय साक्षरता बढ़ाने और महिलाओं की सुरक्षा व गतिशीलता में सुधार की आवश्यकता है।
भविष्य की राह: एक बड़ा बदलाव
'ब्लेंडेड फाइनेंस' का रणनीतिक उपयोग, विशेष रूप से मजबूत CSR पहलों के साथ मिलकर, महिला उद्यमियों के लिए पूंजी की पहुंच को सुलभ बनाने का एक ठोस मार्ग प्रशस्त करता है। यह दृष्टिकोण न केवल व्यक्तिगत व्यवसायों को सशक्त बना सकता है, बल्कि अधिक समावेशी और लचीला वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र (financial ecosystem) भी बना सकता है। भारत का लक्ष्य 2030 तक USD7 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनना है, जिसके लिए महिलाओं की कार्यबल भागीदारी को कम से कम 50% तक बढ़ाना आवश्यक है। 'ब्लेंडेड फाइनेंस' इस बदलाव को सुविधाजनक बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण लीवर प्रदान करता है, जो टिकाऊ वित्तीय संरचनाएं बनाकर बड़े पैमाने पर आर्थिक प्रभाव उत्पन्न कर सकता है। इन वित्तीय उपकरणों का निरंतर विकास, सहायक नीतिगत ढाँचे के साथ मिलकर, भारत की महिला उद्यमियों की पूरी क्षमता को साकार करने और व्यापक लैंगिक समानता प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।