ग्लोबल स्तर पर डिजिटल ट्रांजैक्शन साल 2030 तक दोगुने होने का अनुमान है। भारत UPI और e-Rupee के जरिए इस रेस में सबसे आगे है, लेकिन सिर्फ ग्रोथ देखकर निवेश न करें, क्योंकि रेगुलेटरी दबाव और मार्जिन का रिस्क अभी भी बना हुआ है।
दुनिया भर का पेमेंट सेक्टर बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। जानकारों का अनुमान है कि साल 2030 तक नॉन-कैश ट्रांजैक्शन का वॉल्यूम मौजूदा स्तर से दोगुना हो जाएगा। भारत में यह बदलाव Unified Payments Interface (UPI) की बदौलत काफी तेज है। अब यह रिटेल पेमेंट से आगे बढ़कर कमर्शियल इकोसिस्टम और RBI की डिजिटल करेंसी, यानी e-Rupee (CBDC) की ओर कदम बढ़ा रहा है।
B2B पेमेंट्स की ओर शिफ्ट
रिटेल ट्रांजैक्शन से हटकर अब कंपनियां B2B और ट्रेजरी ऑपरेशंस को डिजिटल बना रही हैं। कागजी काम कम होने से प्रोक्योरमेंट और इंटरनेशनल ट्रेड में एफिशिएंसी बढ़ेगी। भारतीय वित्तीय संस्थानों के लिए यह एक बड़ा ग्रोथ फ्रंटियर है, जहाँ वे कोर इंफ्रास्ट्रक्चर को तुरंत फंड ट्रांसफर के लिए अपग्रेड कर रहे हैं।
मुनाफे पर दबाव और रेगुलेटरी नियम
निवेशकों को यह समझना होगा कि हर ट्रांजैक्शन ग्रोथ से कंपनी का मुनाफा नहीं बढ़ता। भारत में UPI मर्चेंट ट्रांजैक्शंस पर जीरो-फी स्ट्रक्चर होने के कारण फिनटेक कंपनियों के मार्जिन पर दबाव है। अब कंपनियां क्रेडिट, इंश्योरेंस और सब्सक्रिप्शन जैसे वैल्यू-एडेड सर्विसेज से पैसा कमाने पर फोकस कर रही हैं।
इसके अलावा, RBI का कड़ा रुख भी एक बड़ा फैक्टर है। डिजिटल लेंडिंग, डेटा प्राइवेसी और KYC जैसे मामलों में बढ़ते रेगुलेटरी खर्च से कंपनियों का ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ रहा है।
साइबर सुरक्षा और भरोसा
जैसे-जैसे वॉल्यूम बढ़ रहा है, वैसे-वैसे साइबर खतरों का रिस्क भी बढ़ रहा है। बैंकों और फिनटेक कंपनियों के लिए सुरक्षा अब सबसे बड़ी प्राथमिकता है। कोई भी बड़ी सिक्योरिटी चूक कंपनी के भविष्य और शेयर की कीमतों पर भारी असर डाल सकती है। भविष्य में वही कंपनियां लंबी दौड़ की खिलाड़ी साबित होंगी जो टेक्नोलॉजी और सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर में मजबूती से निवेश करेंगी।
