भारतीयों के लोन लेने के तरीके में बड़ा बदलाव आया है। मिलेनियल्स (Millennials) अब बड़े खर्चों जैसे घर और गाड़ी के लिए लोन ले रहे हैं, वहीं जेन Z (Gen Z) कम उम्र में ही क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन का इस्तेमाल शुरू कर रहे हैं। दूसरी ओर, सीनियर सिटीजन अपनी प्रॉपर्टी और निवेश पर लोन ले रहे हैं। इस बदलाव का सीधा असर बैंकों और NBFCs पर पड़ रहा है, जिन्हें अब अपनी ग्रोथ और रिस्क मैनेजमेंट की रणनीति बदलनी पड़ रही है।
मिलेनियल्स की खर्च करने की क्षमता
भारत में 20s के आखिरी से 40s की शुरुआत तक के मिलेनियल्स, रिटेल क्रेडिट की ग्रोथ का मुख्य इंजन हैं। ये लोग घर और गाड़ियां खरीदने जैसे बड़े लक्ष्यों को पूरा करने के लिए EMI का इस्तेमाल खूब कर रहे हैं। शहरों में प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतों की वजह से, मॉर्गेज लोन (Mortgage Loan) इनके लिए एक ज़रूरी विकल्प बन गया है। क्योंकि ये जनरेशन एक साथ कई EMI मैनेज करती है, इसलिए इनकी लोन लेने की आदत सीधे तौर पर इनकम स्टेबिलिटी (Income Stability) और शहरीकरण (Urbanization) से जुड़ी है। लेंडर्स (Lenders) के लिए यह ग्रुप अच्छी वॉल्यूम (Volume) तो देता है, लेकिन इनके डेट-टू-इनकम रेशियो (Debt-to-Income Ratio) पर लगातार नज़र रखने की ज़रूरत होती है।
जेन Z का जल्दी क्रेडिट एक्सेस
जेन Z की सोच थोड़ी अलग है। बड़े एसेट्स (Assets) जमा करने का इंतज़ार करने के बजाय, यह जनरेशन पर्सनल लोन (Personal Loan) और क्रेडिट कार्ड (Credit Card) का इस्तेमाल करके जल्दी अपना क्रेडिट फुटप्रिंट (Credit Footprint) बना रही है। भले ही ये लोन छोटे टिकट साइज के हों, लेकिन बैंकों और NBFCs के लिए ये लंबी कस्टमर रिलेशनशिप बनाने में मददगार साबित हो रहे हैं। शुरुआती डेटा यह भी बताता है कि ये बरोअर्स (Borrowers) समय पर पेमेंट करते हैं, लेकिन लंबे क्रेडिट हिस्ट्री (Credit History) की कमी लेंडर्स के लिए एक नई चुनौती खड़ी करती है कि वे आर्थिक मंदी के दौर में इनका परफॉर्मेंस कैसे रहेगा।
सिक्योर्ड बनाम अनसिक्योर्ड क्रेडिट
भारत की पुरानी पीढ़ियां कर्ज़ के मामले में ज़्यादा सतर्क रहती हैं। वे अक्सर सिक्योर्ड क्रेडिट (Secured Credit) यानी गोल्ड, प्रॉपर्टी या फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स (Financial Instruments) के बदले लोन लेना पसंद करती हैं। इस तरीके से उन्हें तुरंत लिक्विडिटी (Liquidity) मिलती है और वे अपने लॉन्ग-टर्म निवेश (Long-term Investment) को बेचते भी नहीं हैं। निवेशकों के लिहाज़ से, सिक्योर्ड लेंडिंग (Secured Lending) बैंकों और NBFCs के लिए ज़्यादा सुरक्षित मानी जाती है, क्योंकि अगर बरोअर डिफॉल्ट (Default) करता है, तो कोलैटरल (Collateral) की वजह से नुकसान की संभावना कम हो जाती है।
रेगुलेटरी और सिस्टमेटिक रिस्क
निवेशकों के लिए यह जानना ज़रूरी है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अनसिक्योर्ड रिटेल लेंडिंग (Unsecured Retail Lending), जिसमें पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड का कर्ज़ शामिल है, में हो रही बढ़ोतरी पर कड़ी नज़र रख रहा है। हालांकि युवा पीढ़ी की मांग बैंकों के रेवेन्यू (Revenue) को बढ़ा रही है, लेकिन यह सिस्टमेटिक रिस्क (Systemic Risk) भी पैदा करती है। RBI पहले भी अनसिक्योर्ड लोन पर रिस्क वेट (Risk Weight) बढ़ा चुका है, जिसका मतलब है कि लेंडर्स को इन एसेट्स के लिए ज़्यादा कैपिटल (Capital) अलग रखना होगा। निवेशकों को यह समझना चाहिए कि जेन Z को लोन देने में आक्रामक विस्तार करने से मार्जिन प्रेशर (Margin Pressure) बढ़ सकता है, अगर लेंडर्स को ज़्यादा कैपिटल रखना पड़े या डिफॉल्सी रेट (Delinquency Rate) बढ़ जाएं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
बैंकों और NBFCs पर नज़र रखने वाले निवेशकों को सिर्फ लोन ग्रोथ के आंकड़ों से आगे देखना चाहिए। लोन बुक की क्वालिटी (Quality) एक अहम पैमाना है। उदाहरण के लिए, अगर कोई लेंडर युवा जनरेशन को दिए जाने वाले अनसिक्योर्ड पर्सनल लोन में ज़्यादा एक्सपोज़्ड (Exposed) है, तो आर्थिक तनाव के दौर में एसेट क्वालिटी (Asset Quality) में ज़्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। इसके विपरीत, सिक्योर्ड क्रेडिट पोर्टफोलियो (Secured Credit Portfolio) पर फोकस करने वाले लेंडर्स ज़्यादा स्थिरता दे सकते हैं। इसके अलावा, पहली बार लोन लेने वालों के लिए अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स (Underwriting Standards) पर मैनेजमेंट की टिप्पणी अहम होगी, क्योंकि इससे पता चलेगा कि फर्म इन नए, युवा ग्राहकों के रिस्क को कैसे मैनेज कर रही है। अंत में, RBI के रिटेल क्रेडिट पर रेगुलेटरी रुख में बदलावों पर भी नज़र रखें, क्योंकि यह सीधे लेंडिंग सेक्टर की प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) और कैपिटल रिक्वायरमेंट (Capital Requirements) को प्रभावित कर सकता है।
