India Credit Boom: क्या बैंक डूब रहे हैं? बढ़ रहा कर्ज, घट रही जमा राशि!

BANKINGFINANCE
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AuthorAditya Rao|Published at:
India Credit Boom: क्या बैंक डूब रहे हैं? बढ़ रहा कर्ज, घट रही जमा राशि!
Overview

भारत में कॉर्पोरेट क्रेडिट ग्रोथ पिछले दो सालों के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि बढ़ती सरकारी बॉन्ड यील्ड (Sovereign Bond Yields) के चलते कंपनियां कैपिटल मार्केट से दूरी बना रही हैं। बैंक लोन में भले ही उछाल आया हो, लेकिन जमा राशि (Deposit Growth) की धीमी रफ्तार बैंकों के मार्जिन को दबा सकती है और उन्हें महंगे शॉर्ट-टर्म फंडिंग साइकिल में धकेल सकती है।

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क्रेडिट का बड़ा खेल

कॉर्पोरेट इंडिया इन दिनों एक बड़े फाइनेंसिंग बदलाव से गुजर रहा है। वोलेटाइल यील्ड (Volatile Yield) के माहौल से बचने के लिए कंपनियां कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट को छोड़कर बैंक क्रेडिट की ओर भाग रही हैं। यह सिर्फ पसंद का मामला नहीं है, बल्कि सॉवरेन यील्ड (Sovereign Yield) और बैंक लेंडिंग रेट (Bank Lending Rates) के बीच बढ़ते अंतर का नतीजा है।

ऊपर से देखने पर यह बैंकों के लिए अच्छी खबर लग सकती है, लेकिन यह बैंकिंग सेक्टर की बैलेंस शीट में छिपी कमजोरी को भी दिखाता है। जब Power Grid Corporation of India जैसी कंपनियां बॉन्ड मार्केट को दरकिनार कर बड़े लोन ले रही हैं, तो कॉर्पोरेट कर्ज का सारा जोखिम वापस कमर्शियल बैंकिंग सिस्टम में केंद्रित हो रहा है।

लिक्विडिटी का भारी गैप

फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस (Financial Institutions) के लिए एक मुश्किल हालात बन गए हैं, जहाँ क्रेडिट एक्सपेंशन (Credit Expansion) और डिपॉजिट मोबिलाइजेशन (Deposit Mobilization) के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। लोन ग्रोथ जहां 16.2% की सालाना रफ्तार से बढ़ रही है, वहीं रिटेल डिपॉजिट (Retail Deposit) उतनी तेजी से नहीं बढ़ पा रही है। यह 400-बेसिस-पॉइंट का घाटा लगातार आठ महीनों से बना हुआ है।

इस लिक्विडिटी मिसमैच (Liquidity Mismatch) के चलते बैंकों को सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (Certificate of Deposit) जैसे महंगे साधनों का सहारा लेना पड़ रहा है, जिनके छह महीने के रेट्स एक महीने में ही 88-बेसिस-पॉइंट बढ़ गए हैं। यह फंडिंग गैप (Funding Gap) को पाटने की एक कोशिश है, लेकिन इससे बैंकों की फंड कॉस्ट (Cost of Funds) बढ़ रही है। नतीजतन, मार्जिन पर दबाव आ रहा है क्योंकि बैंक इस बढ़ी हुई लागत को पूरी तरह से कॉर्पोरेट बॉरोअर्स (Corporate Borrowers) पर नहीं डाल पा रहे हैं।

खतरे की घंटी

जोखिम के नजरिए से देखें तो यह ट्रेंड सिस्टमैटिक स्टेबिलिटी (Systematic Stability) पर गंभीर सवाल खड़े करता है। कम रेटिंग वाले बॉरोअर्स (Lower-rated Borrowers) का बॉन्ड मार्केट से बैंक लोन में तेजी से जाना, बैंकों के लोन पोर्टफोलियो की ओवरऑल क्वालिटी को खराब कर रहा है।

अगर भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Pressures) के कारण सॉवरेन यील्ड ऊपर जाती रही, तो बैंक खुद को एक हाई-बीटा लोन पोर्टफोलियो के साथ फंसा हुआ पा सकते हैं, जबकि डिपॉजिट मोबिलाइजेशन की विफलता के कारण उनकी अपनी फंडिंग कॉस्ट भी बढ़ रही है। इसके अलावा, लॉन्ग-टर्म कॉर्पोरेट क्रेडिट को फंड करने के लिए सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट जैसे शॉर्ट-टर्म इंस्ट्रूमेंट्स पर निर्भरता एक खतरनाक ड्यूरेशन मिसमैच (Duration Mismatch) पैदा करती है।

इतिहास गवाह है कि जब बैंक मार्केट शेयर बनाए रखने के लिए डिपॉजिट क्वालिटी पर वॉल्यूम को प्राथमिकता देते हैं, तो सुधार अक्सर अचानक और अंधाधुंध होता है, जो नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (Non-Performing Assets) या लिक्विडिटी क्रंच (Liquidity Crunch) के रूप में सामने आता है।

आगे का रास्ता

मार्केट पार्टिसिपेंट्स (Market Participants) उम्मीद कर रहे हैं कि यह ट्रेंड तब तक जारी रहेगा जब तक सॉवरेन बॉन्ड यील्ड स्थिर नहीं हो जाती, जो कि मौजूदा महंगाई (Inflation) और सेंट्रल बैंक की सावधानी को देखते हुए मुश्किल लग रहा है।

फिलहाल, कॉर्पोरेशन्स बैंक फाइनेंसिंग से बचत निकालना जारी रखेंगी, लेकिन यह मौका संकरा होता जा रहा है क्योंकि बैंकों पर अपने बढ़ते कैपिटल कॉस्ट (Cost of Capital) को ध्यान में रखते हुए लोन की री-प्राइसिंग (Repricing) करने का दबाव बढ़ रहा है। उम्मीद है कि लेंडर्स (Lenders) ज्यादा सेलेक्टिव हो जाएंगे और अंततः ऊंचे मार्जिन वाले, कम अवधि के कॉर्पोरेट क्रेडिट को प्राथमिकता देंगे, ताकि वे डिमांड को पूरा करने और सीमित लिक्विडिटी एनवायरनमेंट (Liquidity Environment) को मैनेज करने के बीच संतुलन बना सकें।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.