ग्रोथ की रफ्तार और रिस्क मैनेजमेंट का संतुलन
भारत का क्रेडिट सेक्टर शानदार रफ्तार दिखा रहा है। दिसंबर 2025 तक कुल AUM (Assets Under Management) 17% बढ़कर ₹1.30 लाख करोड़ के आंकड़े को पार कर गया है। वहीं, फाइनेंशियल ईयर 2026 की तीसरी तिमाही (Q3 FY26) में नए लोन की मंजूरी में 36% की जोरदार बढ़ोतरी हुई है, जो कंज्यूमर और बिजनेस दोनों सेक्टर्स में बढ़ती मांग का साफ संकेत है। इस विस्तार का मुख्य आधार सिक्योर्ड लेंडिंग (Secured Lending) यानी गारंटी वाले लोन बन गए हैं, जिनका हिस्सा बढ़कर 34% हो गया है, जो पिछले साल 30% था। इसमें भी सबसे आगे हैं गोल्ड और होम लोन।
गोल्ड और होम लोन का जलवा
खासकर गोल्ड लोन ने सबको चौंकाया है, जिसका AUM 48% बढ़कर ₹10.6 लाख करोड़ पहुंच गया है। इसकी वजह ₹3 लाख से कम के छोटे लोन की बढ़ती मांग है। सोने के बढ़ते दाम भी इसमें अहम भूमिका निभा रहे हैं, क्योंकि लोग अपनी संपत्ति बेचे बिना ज्यादा लोन ले पा रहे हैं। होम लोन की बात करें तो इसका AUM ₹41 लाख करोड़ पर पहुंच गया है। पब्लिक सेक्टर बैंक इसमें 47.33% की हिस्सेदारी के साथ सबसे आगे हैं। अब टियर-2 और टियर-3 शहरों से भी होम लोन की मांग बढ़ रही है, जो कुल होम लोन का 64% है। अनुमान है कि 2031 तक होम लोन मार्केट USD 809.07 बिलियन का हो जाएगा।
अनसिक्योर्ड लोन की स्थिति
सिक्योर्ड लोन की तरफ झुकाव के बावजूद, अनसिक्योर्ड लेंडिंग (Unsecured Lending) यानी बिना गारंटी वाले लोन भी बढ़ रहे हैं। पर्सनल लोन का AUM 11% बढ़कर ₹15.4 लाख करोड़ हो गया है, जबकि कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन 18% बढ़े हैं। टू-व्हीलर लोन ₹1.8 लाख करोड़ तक पहुंच गए हैं, जिनमें NBFCs (नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज़) का बड़ा हाथ है। डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म और AI की मदद से पर्सनल लोन मिलना आसान हुआ है। 2026 के मध्य तक फिनटेक प्लेटफॉर्म्स 11 करोड़ से ज्यादा लोन दे चुके हैं। हालांकि, क्रेडिट कार्ड जारी करने की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ी है।
एसेट क्वालिटी में सुधार
एक अच्छी खबर यह भी है कि लोन की क्वालिटी (Asset Quality) सुधरी है। नेट 30+ डेलिंक्वेंसी रेट (Net 30+ Delinquency Rate) घटकर 3.3% रह गया है, जो पिछले साल 3.9% था। यह बताता है कि लोग अब लोन की EMI सही समय पर चुका रहे हैं। सिक्योर्ड एसेट्स की तरफ शिफ्ट और बेहतर बोरोअर डिसिप्लिन इसके मुख्य कारण हैं।
दुनिया के मुकाबले भारत की ग्रोथ
दिसंबर 2025 तक भारत की क्रेडिट ग्रोथ लगभग 12.8% सालाना है, जो दूसरे विकसित देशों के मुकाबले काफी अच्छी है। भारत का क्रेडिट-टू-जीडीपी रेशियो करीब 93% है, जो बताता है कि अभी ग्रोथ की काफी गुंजाइश है। महंगाई का कम होना और सरकार की सपोर्टिव फिस्कल पॉलिसीज (Fiscal Policies) भी कंजम्पशन और इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे लोन की मांग बनी हुई है।
पिछली बार से क्यों है अलग?
भारत के क्रेडिट मार्केट ने पहले भी ग्रोथ के बड़े दौर देखे हैं, जैसे 2000 के दशक में जब क्रेडिट ग्रोथ 25% सालाना थी। आज की ग्रोथ मजबूत दिखती है, लेकिन पिछले अनुभवों से पता चलता है कि लेवरेज और एसेट क्वालिटी को संभालना कितना जरूरी है। डिजिटल क्रांति और सरकारी पहलों के सहारे चल रही यह ग्रोथ पिछली बार से ज्यादा मजबूत मानी जा रही है।
रिस्क मैनेजमेंट सबसे अहम
इतनी तेज ग्रोथ के बावजूद, रिस्क मैनेजमेंट (Risk Management) बहुत अहम हो जाता है। जानकारों का कहना है कि 'जिम्मेदार लेंडिंग और समय पर डेटा इनसाइट्स' ग्रोथ और रिस्क को बैलेंस करने के लिए जरूरी हैं। सिक्योर्ड लेंडिंग मजबूत है, लेकिन अनसिक्योर्ड सेगमेंट्स और गोल्ड लोन के बढ़ते ग्राफ पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है। कुछ एनालिस्ट्स का मानना है कि अनसिक्योर्ड रिटेल और माइक्रोफाइनेंस सेगमेंट्स में NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) बढ़ने का खतरा बना रह सकता है।
भविष्य का अनुमान
आने वाले समय में भारतीय बैंकिंग सेक्टर की ग्रोथ 12% के आसपास रहने की उम्मीद है। इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और डोमेस्टिक डिमांड से बैंकों को फायदा होगा। NBFCs, खासकर रिटेल और गोल्ड लोन जैसे सेगमेंट में, बैंकों से तेज ग्रोथ कर सकती हैं।