डेटा से बदल रही लोन देने की तस्वीर
भारत के रिटेल क्रेडिट मार्केट में एक बड़ा बदलाव आया है। अब पुराने क्रेडिट हिस्ट्री की जगह, आपके रियल-टाइम फाइनेंशियल बिहेवियर को देखकर लोन अप्रूव हो रहा है। डिजिटल क्रांति और ग्राहकों की बढ़ती रुचि ने फाइनेंशियल इंक्लूजन (Financial Inclusion) का रास्ता तो खोला है, लेकिन इसके साथ ही नए रिस्क भी पैदा हो गए हैं, जिन पर बारीकी से नज़र रखने की ज़रूरत है।
क्रेडिट एक्सेस बढ़ा, पर रिस्क भी उभर रहे
भारत का क्रेडिट सिस्टम अब डेटा पर बहुत ज़्यादा निर्भर हो गया है। Equifax के अनुसार, लोन की मंज़ूरी और उसकी कीमत अब आपके खर्च करने के पैटर्न और रिपेमेंट की आदतों पर तय हो रही है। इस विस्तृत दृष्टिकोण के साथ, डिजिटल लेंडिंग के बढ़ते चलन से देश के छोटे शहरों और उन लोगों तक क्रेडिट की पहुंच बढ़ी है, जिन्हें पहले आसानी से लोन नहीं मिलता था। एक चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि दिसंबर 2025 तक 18.3 करोड़ भारतीय अपना क्रेडिट स्कोर चेक कर चुके थे, जो कि पिछले साल के मुकाबले 27% ज़्यादा है। ग्राहकों की यह सक्रियता, जो अक्सर उनके स्कोर को बेहतर बनाने में मदद करती है, यह दिखाती है कि अब ज़्यादा जागरूक उपभोक्ता अपने क्रेडिट हेल्थ पर खुद ध्यान दे रहे हैं। Paytm और PhonePe जैसे फिनटेक प्लेटफॉर्म्स फ्री क्रेडिट स्कोर की सुविधा दे रहे हैं, जो पश्चिमी देशों की तुलना में कहीं ज़्यादा सस्ता है।
अनसिक्योर्ड लोन में तेज़ी, RBI का कसा शिकंजा
क्रेडिट के विस्तार में अनसिक्योर्ड लोंस का बड़ा हिस्सा रहा है। मार्च 2024 तक, यह कुल क्रेडिट का लगभग 25.3% हो गया था। इस तेज़ ग्रोथ ने रेगुलेटर्स का ध्यान खींचा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने बैंकों को मज़बूत बनाने और अत्यधिक ग्रोथ को धीमा करने के लिए कंज्यूमर क्रेडिट और क्रेडिट कार्ड पर रिस्क वेट्स (Risk Weights) बढ़ा दिए हैं। इन कदमों का मकसद बैंकिंग सेक्टर को संभावित झटकों से बचाना और अनसिक्योर्ड लेंडिंग के boom के साथ बढ़ते लोन डिफ़ॉल्ट्स को कंट्रोल करना है। इन एक्शन के बावजूद, पिछले दशक में जीडीपी के मुकाबले रिटेल क्रेडिट का प्रतिशत दोगुना होकर FY25 में 18% हो गया है।
फिनटेक का बढ़ता रोल और कॉम्पीटीशन
भारतीय क्रेडिट इंफॉर्मेशन सेक्टर में Equifax (जिसका मार्केट कैप करीब $23.95 बिलियन है और P/E 36.88 है) और TransUnion (मार्केट कैप लगभग $15.1 बिलियन, P/E 33.79) जैसे ग्लोबल प्लेयर्स शामिल हैं। भारत में TransUnion CIBIL और Experian India प्रमुख हैं, जिसमें Experian India ने मार्च 2025 तक ₹531 करोड़ का रेवेन्यू दर्ज किया है। फिनटेक सेक्टर, जिसका अनुमानित मूल्य 2025 में USD 51.2 बिलियन है और 2032 तक USD 145.57 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, एक बड़ा इंजन है। यह डिजिटल लेंडिंग के ज़रिए बाज़ार का लगभग 43% हिस्सा कवर करता है। फिनटेक छोटे पर्सनल लोंस में खास तौर पर मज़बूत हैं, जो फ्लेक्सिबल सॉल्यूशंस तो देते हैं, लेकिन अक्सर कम रेगुलेटेड डेटा रिपोर्टिंग के साथ काम करते हैं, जिससे ट्रांसपेरेंसी को लेकर चिंताएं बढ़ती हैं। ओवरऑल भारतीय फिनटेक मार्केट के 2032 तक 16.1% CAGR की दर से बढ़ने की उम्मीद है।
डेटा-संचालित लेंडिंग में बढ़ते रिस्क
हालांकि ज़्यादा डेटा का इस्तेमाल और ग्राहकों में जागरूकता से लोन की क्वालिटी में सुधार होना चाहिए, लेकिन अनसिक्योर्ड लेंडिंग में तेज़ी से काफी बड़े रिस्क पैदा हो रहे हैं। क्रेडिट कार्ड की डिफॉल्सीज़ (Delinquencies) बढ़ी हैं, जिसमें 91-180 दिनों के डिफ़ॉल्ट लोन जून 2024 तक बढ़कर 7.6% हो गए हैं। क्रेडिट स्कोरिंग के लिए वैकल्पिक डेटा का उपयोग, जो इंक्लूजन को बढ़ावा देता है, नए जोखिम पैदा कर सकता है अगर स्थापित मानकों के मुकाबले उसकी ठीक से जांच न की जाए। RBI के कड़े नियम, जो स्थिरता के लिए ज़रूरी हैं, ग्रोथ को धीमा कर सकते हैं और ग्राहकों व व्यवसायों के लिए लोन की लागत बढ़ा सकते हैं। क्रेडिट कार्ड पेनिट्रेशन (penetration) अभी भी वयस्क आबादी के लगभग 5-6% पर कम है, जो विस्तार की गुंजाइश तो दिखाता है, लेकिन यह भी बताता है कि यह बाज़ार रेगुलेटरी बदलावों और आर्थिक मंदी के प्रति कितना संवेदनशील है। इसके अलावा, कुछ फिनटेक लेंडर्स के पास पारंपरिक बैंकों जितने मज़बूत रिस्क कंट्रोल नहीं हो सकते हैं, जो लोन क्वालिटी और डिफ़ॉल्ट्स की समस्याओं को और बिगाड़ सकते हैं।
भविष्य की ग्रोथ और स्थिरता
भारत के रिटेल क्रेडिट मार्केट में मज़बूत ग्रोथ जारी रहने की उम्मीद है, जिसमें कंज्यूमर क्रेडिट 2033 तक 9.70% CAGR की दर से बढ़कर USD 91.88 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। भविष्य में, कस्टमाइज़्ड बैंकिंग सर्विसेज और ऑटोमेटेड लेंडिंग के लिए AI (Artificial Intelligence) और मशीन लर्निंग (Machine Learning) का ज़्यादा इंटीग्रेशन देखने को मिलेगा। हालांकि, इस ग्रोथ का भविष्य इनोवेशन और मज़बूत रिस्क मैनेजमेंट को संतुलित करने पर निर्भर करेगा, यह सुनिश्चित करते हुए कि फाइनेंशियल इंक्लूजन की दौड़ कहीं बड़े फाइनेंशियल इंस्टेबिलिटी की ओर न ले जाए। रेगुलेटर्स संभवतः अनसिक्योर्ड लोन रिस्क को मैनेज करने, डेटा की सटीकता सुनिश्चित करने और ज़िम्मेदार लेंडिंग प्रैक्टिसेस को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करना जारी रखेंगे।
