भारतीय बैंकिंग सेक्टर के लिए एक अच्छी खबर आई है! बैंकों के ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (GNPA) पहली तिमाही, FY27 तक घटकर लगभग **1.71%-1.8%** पर आ गए हैं, जो पिछले 10 सालों का सबसे निचला स्तर है। पब्लिक सेक्टर बैंकों ने शानदार रिकवरी की है, लेकिन कृषि क्षेत्र में लोन को लेकर स्ट्रेस अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है।
बैड लोन में आई भारी गिरावट
भारतीय बैंकिंग सेक्टर ने एसेट क्वालिटी के मामले में एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया है। पहली तिमाही, FY27 के अंत तक, बैंकों के ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (GNPA) घटकर लगभग 1.71%-1.8% पर आ गए हैं। यह एक दशक पहले की तुलना में एक बड़ा बदलाव है, जब बैंकिंग सेक्टर NPA की भारी मार झेल रहा था। इस सुधार के पीछे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की '4R' स्ट्रैटेजी का बड़ा हाथ रहा है, जिसमें रिकग्निशन (पहचान), रेजोल्यूशन (समाधान), रीकैपिटलाइजेशन (पुनः पूंजीकरण) और रिफॉर्म्स (सुधार) पर जोर दिया गया था।
पब्लिक सेक्टर बैंकों का शानदार प्रदर्शन
खासकर पब्लिक सेक्टर बैंकों ने तो कमाल ही कर दिया है। FY18 में जहाँ इनके NPA रेश्यो 15% के करीब थे, वहीं अब ये घटकर 2% से नीचे आ गए हैं। इस प्रदर्शन के दम पर ये अब प्राइवेट सेक्टर के बैंकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) और SARFAESI जैसे कानूनों के सख्त इस्तेमाल से बैंकों ने बड़े इंडस्ट्रियल खातों से पुराने बैड लोन को काफी हद तक साफ कर दिया है। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में बैंकों ने बड़े पैमाने पर राइट-ऑफ (कर्ज बट्टे खाते में डालना) भी किए हैं, जिसके तहत FY15 से FY24 के बीच अरबों रुपये के बैड लोन को एक्टिव बुक से हटा दिया गया ताकि बैलेंस शीट साफ दिख सके।
कृषि क्षेत्र में बढ़ता जोखिम
इंडस्ट्रियल और कॉर्पोरेट लोन पोर्टफोलियो में जहां जबरदस्त सुधार देखने को मिला है, वहीं अब जोखिम का फोकस कृषि क्षेत्र की ओर शिफ्ट हो गया है। प्रमुख लेंडिंग सेगमेंट्स में सबसे ज्यादा स्ट्रेस कृषि क्षेत्र में ही दिख रहा है, जहाँ GNPA रेश्यो लगातार 6% से ऊपर बना हुआ है। यह एक नई तस्वीर पेश करता है, जहाँ अब सिस्टमैटिक कॉर्पोरेट फेलियर की बजाय सेक्टर-स्पेसिफिक जोखिम बैंकिंग स्ट्रेस का मुख्य कारण बन रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन का असर
यह कृषि स्ट्रेस सीधे तौर पर बाहरी कारकों से जुड़ा है, जिसमें जलवायु परिवर्तन का खतरा भी शामिल है। मानसून का अनिश्चित पैटर्न और अल नीनो जैसी घटनाएं किसानों की लोन चुकाने की क्षमता पर सीधा असर डाल सकती हैं। जैसे-जैसे ये मौसम के पैटर्न कम अनुमानित होते जा रहे हैं, ग्रामीण क्रेडिट पोर्टफोलियो पर पड़ने वाला प्रभाव विश्लेषकों और बैंकों के लिए एक अहम फैक्टर बना हुआ है, जिस पर वे बारीकी से नजर रख रहे हैं।
आगे की राह और नए नियम
आगे चलकर एसेट क्वालिटी में सुधार की गति धीमी पड़ सकती है। चूंकि पुराने कॉर्पोरेट NPA का बड़ा हिस्सा पहले ही सॉल्व या राइट-ऑफ हो चुका है, बैंक अब फ्रेश स्लिपेज (नए NPA बनने) को रोकने पर ध्यान केंद्रित करेंगे। रेगुलेटरी निगरानी सख्त बनी हुई है, और 1 अक्टूबर, 2026 से नए नियम लागू होने वाले हैं। इन नियमों के तहत, बैंक और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFC) किसी भी एक्वायर्ड स्ट्रेस्ड एसेट को मूल डिफॉल्ट करने वाले उधारकर्ता को वापस नहीं बेच पाएंगी। इस बदलाव का मकसद लोन रिकवरी प्रोसेस में मौजूद खामियों को दूर करना और वसूली के प्रयासों को और प्रभावी बनाना है।
निवेशकों और मार्केट पर नजर रखने वालों के लिए, अगली बड़ी चुनौती यह देखना होगी कि बैंक कमज़ोर मानसून के दौरान ग्रामीण लोन स्ट्रेस को कैसे मैनेज करते हैं और एसेट रेजोल्यूशन के लिए कड़े रेगुलेटरी माहौल के अनुसार खुद को कैसे ढालते हैं।
