विदेश में पढ़ाई के लिए एजुकेशन लोन लेने वाले भारतीय छात्रों के सामने एक बड़ी चुनौती आ गई है। अब उन्हें यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि रुपये में लोन लें या विदेशी करेंसी में। पिछले दो सालों में विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या **31%** कम हो गई है, ऐसे में परिवारों को यह सोचना पड़ रहा है कि वे विदेशी करेंसी का कर्ज चुकाने के लिए रुपये में कमाई कैसे करेंगे।
विदेशी पढ़ाई का बढ़ता खर्च और करेंसी का खेल
विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने की चाह रखने वाले भारतीय छात्र आजकल अपनी पढ़ाई के फाइनेंस को लेकर काफी माथापच्ची कर रहे हैं। करेंसी में उतार-चढ़ाव और बदलते जॉब मार्केट की वजह से एजुकेशन लोन का गणित भी बदल गया है। परिवारों के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है कि वे किसी भारतीय बैंक से रुपये में लोन लें या फिर किसी विदेशी संस्थान से, जिसका लोन अक्सर वहां की करेंसी में होता है।
यह फैसला इसलिए भी अहम हो गया है क्योंकि पिछले दो सालों में विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में 31% की कमी आई है। इसके पीछे आर्थिक दबाव और सख्त इमिग्रेशन नीतियां दोनों कारण हैं।
विदेशी करेंसी लोन का सबसे बड़ा जाल
एक्सपर्ट्स का मानना है कि सबसे बड़ा वित्तीय खतरा यह है कि विदेशी करेंसी वाले लोन को भारतीय रुपये में कमाई करके चुकाना पड़े। अगर कोई छात्र डॉलर में लोन लेता है और भारत लौटकर नौकरी करता है, तो उस पर दोहरा असर पड़ता है। उसका कर्ज तो मजबूत विदेशी करेंसी में बना रहता है, जबकि उसकी कमाई रुपये के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करती है।
यह गड़बड़ी समय के साथ चुकाई जाने वाली राशि को काफी बढ़ा सकती है, खासकर तब जब 2026 के दौरान भारतीय रुपया कई बड़ी करेंसी के मुकाबले काफी कमजोर हुआ है।
दूसरे देशों से लोन लेने के फायदे और नुकसान
अगर छात्र सीधे पढ़ाई वाले देश के किसी लेंडर से लोन लेते हैं, तो इसमें अलग तरह के फायदे और नुकसान हैं। ऐसे लोन आमतौर पर वहां की लोकल करेंसी में ही दिए और चुकाए जाते हैं, जिससे अगर छात्र वहीं नौकरी करने का इरादा रखता है तो तुरंत करेंसी का कोई रिस्क नहीं रहता।
इसके अलावा, ऐसे लोन की रीपेमेंट अवधि अक्सर भारत के 10 से 15 साल के मुकाबले लंबी होती है, जिससे मंथली ईएमआई कम हो सकती है। कुछ विदेशी लेंडर्स छात्रों को लोकल क्रेडिट हिस्ट्री बनाने में भी मदद करते हैं, जो वहां बसने का इरादा रखने वालों के लिए फायदेमंद हो सकता है।
लेकिन, इन फायदों के साथ चुनौतियां भी हैं। विदेशी बाजारों में वेरिएबल इंटरेस्ट रेट का खतरा और सख्त एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया, जो शायद भारतीय बैंकिंग सिस्टम के सपोर्ट स्ट्रक्चर से मेल न खाएं।
ब्याज दरों का खेल और मैक्रो रिस्क
ब्याज दरों का अंतर भी इन कैलकुलेशन में एक बड़ा फैक्टर है। जहां भारतीय ओवरसीज एजुकेशन लोन पर फ्लोटिंग रेट 10% से 14% तक चल रहे हैं, वहीं विदेशी प्राइवेट स्टूडेंट लोन में सालाना ब्याज दरें काफी ज्यादा हो सकती हैं, कुछ फिक्स्ड-रेट प्रोडक्ट 14% को भी पार कर जाते हैं।
परिवारों को बड़े मैक्रो रिस्क को भी ध्यान में रखना होगा, जैसे भारत में लगातार महंगाई की संभावना और अमेरिका व अन्य प्रमुख देशों में वीजा या वर्क परमिट नियमों का सख्त होना। ये रेगुलेटरी बदलाव पढ़ाई के बाद काम के मौकों को सीमित करते हैं, जिससे ग्रेजुएट्स पर भारी विदेशी करेंसी वाले कर्ज के साथ घर लौटने का जोखिम बढ़ जाता है।
इसलिए, ऐसे निवेश की योजना बना रहे परिवारों का ध्यान अब सिर्फ भविष्य की एक्सचेंज रेट की भविष्यवाणी पर निर्भर रहने के बजाय करेंसी के उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए एक फाइनेंशियल कुशन बनाए रखने पर शिफ्ट हो रहा है। निवेशक और परिवार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ब्याज दर नीतियों के साथ-साथ अमेरिका और अन्य प्रमुख मेजबान देशों की इमिग्रेशन और वर्क-ऑथोराइजेशन नीतियों में आने वाले अपडेट्स पर नजर रख सकते हैं, क्योंकि ये फैक्टर विदेशी फंडिंग वाली शिक्षा की दीर्घकालिक व्यवहार्यता को सीधे तौर पर प्रभावित करेंगे।
