Student Loan: अमेरिका-कनाडा का क्रेज कम, यूरोप-ऑस्ट्रेलिया की तरफ भागे भारतीय छात्र

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AuthorMehul Desai|Published at:
Student Loan: अमेरिका-कनाडा का क्रेज कम, यूरोप-ऑस्ट्रेलिया की तरफ भागे भारतीय छात्र

FY26 में एजुकेशन लोन की मांग में **17.8%** का उछाल आया है। वीजा नियमों में सख्ती के कारण भारतीय छात्र अब अमेरिका और कनाडा के बजाय यूरोप और ऑस्ट्रेलिया को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे बैंकों के रिस्क मॉडल बदल रहे हैं।

एजुकेशन लोन का मार्केट एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। FY26 के आंकड़ों के मुताबिक, भले ही कुल लोन एप्लिकेशन में 17.8% की जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, लेकिन छात्रों की पसंद बदल गई है। जहां पहले अमेरिका और कनाडा पहली पसंद हुआ करते थे, वहीं अब छात्र ऑस्ट्रेलिया, आयरलैंड और जर्मनी की ओर रुख कर रहे हैं, क्योंकि वहां इमिग्रेशन नियम ज्यादा स्थिर हैं।

कैसे बदल रहे हैं लेंडर्स के नियम?

इस बदलाव ने बैंकों और NBFCs को सोचने पर मजबूर कर दिया है। पहले लोन कोलैटरल (Collateral) यानी संपत्ति के आधार पर मिलते थे, लेकिन अब लेंडर्स 'मेरिट-बेस्ड अंडरराइटिंग' (Merit-based underwriting) पर फोकस कर रहे हैं। इसमें छात्र की शैक्षणिक योग्यता, यूनिवर्सिटी की रैंकिंग और उस कोर्स से भविष्य की कमाई की संभावनाओं को परखा जा रहा है।

सेक्टर की ग्रोथ और चुनौतियां

भारत में एजुकेशन लोन का कुल पोर्टफोलियो ₹8.58 लाख करोड़ के पार पहुंच गया है। NBFCs के एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) में 20% की ग्रोथ की उम्मीद है। हालांकि, निवेशकों के लिए चिंता का विषय क्रेडिट रिस्क है। नए बाजारों में रोजगार की अनिश्चितता और विदेशी मुद्रा में उतार-चढ़ाव (Currency risk) से लोन की रिकवरी पर दबाव पड़ सकता है। इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया और आयरलैंड जैसे देशों के वीजा नियमों में अचानक बदलाव लेंडर्स के लिए बड़ा रिस्क फैक्टर बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि बैंक इन नई भौगोलिक परिस्थितियों में अपने नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) को कैसे मैनेज करते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.