प्राइवेट इक्विटी कंपनियां और घरेलू फार्मा कंपनियां अब 'बाय-एंड-बिल्ड' (Buy-and-Build) रणनीति के जरिए बड़े पैमाने पर कारोबार का विस्तार कर रही हैं। यह कंसोलिडेशन जहां एफिशिएंसी बढ़ाने का मौका है, वहीं निवेशकों को बढ़ते कर्ज और इंटीग्रेशन की चुनौतियों पर भी नजर रखने की जरूरत है।
भारतीय फार्मा और हेल्थकेयर इंडस्ट्री विकास के नए दौर में प्रवेश कर रही है। अब कंपनियां केवल ऑर्गेनिक ग्रोथ पर निर्भर रहने के बजाय 'बाय-एंड-बिल्ड' मॉडल को तेजी से अपना रही हैं। इसमें एक मजबूत फाउंडेशन कंपनी को खरीदकर उसके साथ छोटी कंपनियों को जोड़ा जा रहा है ताकि एक बड़ी और एफिशिएंट चेन तैयार की जा सके। इसका मुख्य मकसद सप्लाई चेन पर कंट्रोल, प्रोक्योरमेंट कॉस्ट को कम करना और मार्केट शेयर को बढ़ाना है।
प्राइवेट इक्विटी का दबदबा
KKR जैसी बड़ी प्राइवेट इक्विटी फर्में अस्पताल नेटवर्क बनाने में जुटी हैं, जिसमें Medicover, Baby Memorial Hospital, और HCG जैसे नाम शामिल हैं। वहीं, ChrysCapital ने Novartis India में अपनी हिस्सेदारी के जरिए पोर्टफोलियो को मजबूत किया है। इन कंपनियों का फोकस टियर-2 और टियर-3 शहरों पर है, ताकि आने वाले समय में इनका वैल्यूएशन बेहतर हो सके।
घरेलू फार्मा कंपनियों की चाल
Torrent Pharmaceuticals और Mankind Pharma जैसी कंपनियां भी स्थानीय संपत्तियों को खरीदकर अपनी पहुंच बढ़ा रही हैं। ये कंपनियां केवल भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यूरोप और अन्य उभरते बाजारों में ऑन्कोलॉजी और बायोलॉजिक्स जैसे हाई-वैल्यू सेगमेंट पर दांव लगा रही हैं।
निवेशकों के लिए चेतावनी (Risks)
यह स्ट्रैटेजी भले ही आकर्षक लगे, लेकिन इसके साथ कुछ बड़े जोखिम भी जुड़े हैं:
- इंटीग्रेशन चैलेंज: अलग-अलग कल्चर और सिस्टम वाली कंपनियों को एक साथ जोड़ना आसान नहीं होता, जिससे मैनेजमेंट पर दबाव बढ़ता है।
- कर्ज का बोझ (Debt Pressure): आक्रामक खरीदारी के लिए कंपनियों को कर्ज लेना पड़ता है। अगर उम्मीद के मुताबिक रेवेन्यू नहीं आया, तो बैलेंस शीट पर बुरा असर पड़ सकता है।
- ओवरपेइंग का रिस्क: प्रतिस्पर्धी बाजार में किसी एसेट के लिए ज्यादा कीमत चुकाना रिटर्न को नुकसान पहुंचा सकता है।
निवेशकों को सलाह है कि वे कंपनियों के Debt-to-Equity रेश्यो और मैनेजमेंट द्वारा किए जा रहे कॉस्ट-बेनिफिट एनालिसिस पर पैनी नजर रखें।
