भारतीय निवेशक विदेशी बाजार की ओर क्यों भाग रहे हैं? जानिए कारण

BANKINGFINANCE
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
भारतीय निवेशक विदेशी बाजार की ओर क्यों भाग रहे हैं? जानिए कारण
Overview

भारतीय निवेशक अब भारतीय शेयर बाज़ार से मुंह मोड़कर अमेरिकी इक्विटी (US Equities) की ओर अपना पैसा लगा रहे हैं। विदेशी एसेट एलोकेशन में **43.7%** की भारी बढ़ोतरी देखी गई है। भारतीय बाज़ारों में ठहराव और रुपये की कमजोरी निवेशकों को अंतरराष्ट्रीय इंडेक्स में निवेश करने पर मजबूर कर रही है।

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भारतीय निवेशक विदेशी बाज़ार का रुख कर रहे हैं

भारतीय निवेशकों का पैसा अब घरेलू शेयर बाज़ारों से निकलकर विदेशी बाज़ारों में जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, कुल विदेशी निवेश का यह हिस्सा $440.22 मिलियन है, लेकिन इसमें तेजी से हो रही बढ़ोतरी यह बताती है कि अब बड़े संस्थान और आम निवेशक भी सिर्फ डायवर्सिफिकेशन (Diversification) के लिए नहीं, बल्कि अमेरिकी एसेट्स (US Assets) को ज़रूरी मानने लगे हैं। इस बदलाव की मुख्य वजह है प्रदर्शन का बड़ा अंतर: S&P 500 ने भारत के BSE 500 को पीछे छोड़ दिया है, जिससे भारतीय निवेशकों के लिए सिर्फ घरेलू निवेश पर टिके रहना महंगा साबित हो रहा है।

रुपये की कमजोरी से सुरक्षा का उपाय

यह कदम भारतीय रुपये (Indian Rupee) की लगातार कमजोरी से बचने का एक तरीका भी है। डॉलर-डिनॉमिनेटेड एसेट्स (Dollar-denominated assets) में निवेश करके, निवेशक अमेरिकी शेयरों की ग्रोथ और करेंसी एप्रिसिएशन (Currency appreciation) दोनों का फायदा उठाने का लक्ष्य रखते हैं। जब रुपया एक साल में डॉलर के मुकाबले लगभग 12% तक गिरता है, तो अंतरराष्ट्रीय पोर्टफोलियो को काफी फायदा होता है। करेंसी का यह असर यह भी सुनिश्चित करता है कि अगर अमेरिकी टेक शेयरों की कीमतों में गिरावट आती भी है, तो रुपये में वापस कंवर्ट होने पर भारतीय निवेशकों को होने वाला कुल नुकसान सीमित रहता है।

पूरी तरह से बदलाव में रुकावटें

बढ़ती दिलचस्पी के बावजूद, भारतीय वित्तीय प्रणाली में कुछ सीमाएं हैं। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India) की लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (Liberalized Remittance Scheme - LRS) विदेश में निवेश का मुख्य जरिया है, लेकिन इसके सख्त नियम बार-बार ट्रेडिंग को हतोत्साहित करते हैं। इसके अलावा, सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने पूरे उद्योग के लिए विदेशी म्यूचुअल फंड (Overseas Mutual Fund) में निवेश की सीमा $7 बिलियन तय की है। एक बार यह कैप पूरी हो जाने पर, फंड मैनेजरों को नया पैसा लेना बंद करना पड़ता है, जिससे रिटेल निवेशकों को एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETFs) या डायरेक्ट ब्रोकरेज (Direct brokerage) सेवाओं का उपयोग करना पड़ता है। इससे ऐसी स्थिति बनती है कि केवल डायरेक्ट एक्सेस वाले या महंगे ईटीएफ (ETFs) खरीदने के लिए पर्याप्त पैसा रखने वाले निवेशक ही लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निवेश कर सकते हैं।

जोखिम और अमल में दिक्कतें

अमेरिकी बाज़ारों पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित करने से टेक्नोलॉजी (Technology) और कंज्यूमर डिस्क्रिशनरी (Consumer discretionary) जैसे सेक्टरों में उच्च अस्थिरता (Volatility) की अनदेखी हो जाती है। सीधे निवेश करने में काउंटरपार्टी जोखिम (Counterparty issues) और जटिल टैक्स नियमों जैसी दिक्कतें शामिल हैं, क्योंकि विदेशी एसेट्स पर घरेलू एसेट्स की तुलना में अलग तरह से टैक्स लगता है। NSE इंटरनेशनल एक्सचेंज (NSE IX) का उपयोग करने वाले निवेशकों को प्रमुख अमेरिकी एक्सचेंजों की तुलना में कम ट्रेडिंग एक्टिविटी का भी सामना करना पड़ता है। NSE IX पर कम वॉल्यूम (Volumes) के कारण कीमतों में ज़्यादा अंतर आ सकता है, खासकर बाज़ार में उथल-पुथल के दौरान। भारत के वित्तीय बुनियादी ढांचे और वैश्विक बाज़ार तक पहुंच के बीच का अंतर, स्थानीय बाज़ारों में मंदी से बचने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.