भारतीय घरों में रखे सोने का भंडार रिकॉर्ड **₹390 लाख करोड़** तक पहुंच गया है, जो देश की कुल GDP से भी ज्यादा है। हालांकि, इसका सिर्फ **8%** हिस्सा ही फॉर्मल सेक्टर में लोन के लिए इस्तेमाल होता है, जिससे गोल्ड-लोन मार्केट के लिए बड़ी संभावनाएं खुल रही हैं।
भारतीय परिवारों के पास जमा सोने का कुल मूल्य अब रिकॉर्ड ₹390 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। यह आंकड़ा फाइनेंशियल ईयर 2026 की देश की नॉमिनल GDP (₹357 लाख करोड़) से भी अधिक है। करीब 28,000 टन का यह विशाल भंडार ज्यादातर घरों की तिजोरियों में बंद रहता है। फाइनेंशियल सेक्टर के लिए चुनौती यह है कि कैसे इस 92% असंगठित सोने को औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाया जाए।
संगठित लेंडिंग (Organized Lending) की ओर बदलाव
मार्च 2026 तक, औपचारिक बैंकिंग और NBFC सेक्टर में गोल्ड लोन का कुल पोर्टफोलियो ₹18.6 लाख करोड़ था। कुल सोने के भंडार के मुकाबले यह बहुत कम है। इसी वजह से विशेषज्ञों का मानना है कि संगठित गोल्ड-लोन इंडस्ट्री 28% की सालाना दर (CAGR) से बढ़ सकती है और मार्च 2028 तक इसका लोन बुक साइज ₹30 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है।
इंस्टीट्यूशनल निवेशकों का इस सेक्टर के प्रति झुकाव बढ़ने का मुख्य कारण यह है कि असुरक्षित पर्सनल लोन (Unsecured Personal Loans) की तुलना में गोल्ड लोन में जोखिम कम होता है क्योंकि यह लिक्विड कोलैटरल (Liquid Collateral) से सुरक्षित होता है। आज गोल्ड लोन देश में होम लोन के बाद दूसरी सबसे बड़ी रिटेल लेंडिंग कैटेगरी बन चुका है।
जोखिम और बाजार की सच्चाई
विकास की अपार संभावनाओं के बीच निवेशकों को कुछ चुनौतियों पर ध्यान देना चाहिए। सबसे बड़ा जोखिम सोने की कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव है। चूंकि लोन 'लोन-टू-वैल्यू' (LTV) रेशियो पर दिए जाते हैं, इसलिए सोने की कीमतें गिरने पर लेंडर्स के लिए दबाव बढ़ सकता है।
साथ ही, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की कड़ी निगरानी भी सेक्टर के लिए अहम है। LTV रेशियो, वैल्यूएशन के तरीके या रिकवरी प्रोसेस में कोई भी रेगुलेटरी सख्ती ग्रोथ की रफ्तार को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा, असंगठित मार्केट (स्थानीय साहूकारों) से ग्राहकों को फॉर्मल सिस्टम में लाना भी एक लंबी लड़ाई है। अब नजरें इस पर होंगी कि लेंडर्स ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में अपनी पहुंच कैसे बढ़ाते हैं और मार्केट की अस्थिरता को कैसे मैनेज करते हैं।
