साल 2026 के शुरुआती सात महीनों में भारतीय कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर **$8.8 बिलियन** की डील की हैं, जो पिछले साल के मुकाबले **76%** अधिक है। घरेलू बाजार में सुस्ती के बीच कंपनियां अब AI तकनीक और नए मार्केट की तलाश में विदेशी फर्मों को खरीद रही हैं।
घरेलू बाजार से विदेशी बाजार की ओर रुख
भारतीय कॉरपोरेट्स का फोकस अब घरेलू सौदों से हटकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों की ओर बढ़ गया है। साल 2026 के पहले सात महीनों में भारतीय फर्मों ने विदेशी अधिग्रहणों पर $8.8 बिलियन खर्च किए हैं। दिलचस्प बात यह है कि इसी दौरान घरेलू डील एक्टिविटी में 14% की गिरावट दर्ज की गई है, जो कुल $10.1 बिलियन पर सिमट गई है। यह बदलाव एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जहां कंपनियां भारत से बाहर अपनी पहुंच और तकनीकी क्षमताएं बढ़ाना चाहती हैं।
AI तकनीक की भूख
इस खरीदारी की मुख्य वजह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक टेक्नोलॉजी है। Infosys और Coforge जैसी कंपनियां खुद सिस्टम बनाने के बजाय उन विदेशी फर्मों को खरीदना बेहतर समझ रही हैं, जिनके पास पहले से ही टेक्नोलॉजी और ग्लोबल मार्केट की पकड़ मौजूद है। इससे कंपनियों को कम समय में नए ग्लोबल कस्टमर्स तक पहुंचने में मदद मिल रही है।
निवेशकों का बदला नजरिया
बाजार इस रणनीति को सकारात्मक रूप से देख रहा है। जिन कंपनियों ने 2026 में विदेशी डील की घोषणा की, उनके शेयर में अगले 30 दिनों के भीतर औसत 3.7% का उछाल देखा गया। यह पिछले दो वर्षों (2024-25) के रुझानों से बिल्कुल अलग है, जब बड़े अधिग्रहणों को बाजार नकारात्मक नजरिए से देखता था।
जोखिमों को नजरअंदाज न करें
हालांकि, विदेशी अधिग्रहण अपने साथ कुछ बड़े जोखिम भी लेकर आते हैं। भारी-भरकम कीमत चुकाने के चक्कर में कंपनी के कैश रिजर्व पर दबाव बढ़ सकता है या उसे अतिरिक्त कर्ज (Debt) लेना पड़ सकता है। इसके अलावा, विदेशी संस्कृति और ऑपरेशंस को भारत की मुख्य कंपनी में इंटीग्रेट करना एक बड़ी चुनौती है। अगर मैनेजमेंट का निर्णय गलत हुआ या अधिग्रहण की कीमत बहुत ज्यादा रही, तो इससे नेट प्रॉफिट और कंपनी की फाइनेंशियल हेल्थ प्रभावित हो सकती है।
इसके अतिरिक्त, करेंसी फ्लक्चुएशंस भी डील की लागत को प्रभावित कर सकते हैं। अब निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां इन विदेशी एसेट्स को कैसे संभालती हैं और क्या यह अधिग्रहण भविष्य में सही रिटर्न में तब्दील हो पाते हैं या नहीं।
