देश की दिग्गज कंपनियों ने बॉन्ड जारी करने के अपने **₹97,000 करोड़** के प्लान को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। FY26 से लेकर अगस्त 2026 तक का यह डेटा बताता है कि कंपनियों और निवेशकों के बीच ब्याज दरों (Yield) को लेकर बनी सहमति न बन पाने के कारण यह स्थिति पैदा हुई है।
बॉन्ड प्लान क्यों हुए रद्द?
बॉन्ड बाजार में यह सुस्ती पैसे की कमी से नहीं, बल्कि 'प्राइसिंग स्टैंडऑफ' यानी कीमतों को लेकर मतभेद से आई है। असल में, कंपनियां अपनी बरोइंग कॉस्ट (Borrowing Cost) को कम रखना चाहती हैं, जबकि निवेशक महंगाई और ग्लोबल संकेतों के चलते ऊंचे रिटर्न (Yield) की मांग कर रहे हैं। जब दोनों के बीच तालमेल नहीं बैठता, तो कंपनियां बॉन्ड जारी करने के बजाय उसे रद्द करना ही बेहतर समझती हैं। बता दें कि पिछले फाइनेंशियल ईयर में ₹79,500 करोड़ के बॉन्ड प्लान रद्द हुए थे, जबकि चालू वित्त वर्ष में अगस्त तक ₹17,500 करोड़ के प्लान पर कैंची चल चुकी है।
सरकारी कंपनियों पर सबसे ज्यादा असर
इस संकट की सबसे बड़ी मार NABARD, Power Finance Corporation (PFC), SIDBI और Indian Oil Corporation (IOC) जैसी सरकारी दिग्गज कंपनियों पर पड़ी है। इन संस्थाओं को अपनी फंडिंग जरूरतों के लिए बॉन्ड मार्केट पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और एग्रीकल्चर प्रोजेक्ट्स में देरी की संभावना बढ़ गई है।
फंड जुटाने का बदलता रास्ता
बाजार में लिक्विडिटी की कोई कमी नहीं है, लेकिन कैपिटल की लागत एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। फिलहाल, कई कंपनियां बॉन्ड मार्केट के बजाय बैंक लोन या दूसरे वैकल्पिक क्रेडिट रास्तों को अपना रही हैं। साथ ही, कुछ भारतीय फर्मों ने ग्लोबल मार्केट से भी फंड जुटाने में कामयाबी हासिल की है, जिससे यह साफ है कि समस्या भारतीय घरेलू बॉन्ड बाजार की शर्तों में है, न कि कंपनियों की आर्थिक सेहत में।
आगे चलकर निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी होगी कि क्या कंपनियां बैंक लोन से काम चला पाती हैं या फिर उन्हें बॉन्ड मार्केट में ऊंचे रेट्स पर समझौता करना पड़ेगा। साथ ही, Reserve Bank of India (RBI) की अगली पॉलिसी और ग्लोबल ऑयल प्राइसेज पर निवेशकों की पैनी नजर बनी रहेगी।
