Indian Firms Raise ₹2.53 Trillion via Commercial Paper in June

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Indian Firms Raise ₹2.53 Trillion via Commercial Paper in June

भारतीय कंपनियों ने जून में कमर्शियल पेपर के जरिए **₹2.53 लाख करोड़** जुटाए, जो जुलाई 2021 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। यह **84.6%** की मासिक बढ़ोतरी दिखाता है कि कंपनियां वर्किंग कैपिटल की जरूरतों को पूरा करने और कर्ज को रीफाइनेंस करने के लिए सस्ती शॉर्ट-टर्म मार्केट फंडिंग की ओर बढ़ रही हैं।

कंपनियों की मार्केट फंडिंग पर बढ़ी निर्भरता

जून के महीने में भारतीय कंपनियों ने कमर्शियल पेपर (Commercial Paper) के जरिए फंड जुटाने में जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की है। यह पिछले लगभग पांच सालों में शॉर्ट-टर्म मार्केट से फंड जुटाने का सबसे ऊंचा स्तर रहा। आंकड़ों के अनुसार, कंपनियों ने पिछले महीने इन डेट इंस्ट्रूमेंट्स के माध्यम से ₹2.53 लाख करोड़ जुटाए। यह मई के ₹1.37 लाख करोड़ की तुलना में 84.6% अधिक है और जून 2025 की तुलना में 59.4% की बढ़ोतरी दिखाता है।

मार्केट फंडिंग की ओर झुकाव

कमर्शियल पेपर असुरक्षित, शॉर्ट-टर्म डेट इंस्ट्रूमेंट्स होते हैं जिन्हें कंपनियां अपनी तात्कालिक नकदी की जरूरतों को पूरा करने के लिए जारी करती हैं। ₹2.53 लाख करोड़ तक का यह उछाल, जो जुलाई 2021 के बाद सबसे अधिक मासिक वॉल्यूम है, कॉर्पोरेट फाइनेंस में एक बड़ी रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है। कंपनियां आकर्षक ब्याज दरों के कारण पारंपरिक बैंक ऋणों के बजाय मार्केट के रास्ते को अधिक चुन रही हैं। यह ट्रेंड बड़े कॉर्पोरेट्स और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) में विशेष रूप से देखा जा रहा है, जो उच्च लागत वाले बैंक क्रेडिट को कम लागत वाले मार्केट से मिले कर्ज से बदल रहे हैं।

फंडिंग में बढ़ोतरी के कारण

इस बढ़ोतरी के मुख्य कारणों में मैन्युफैक्चरिंग और रिटेल जैसे क्षेत्रों की मौसमी वर्किंग कैपिटल की जरूरतें, साथ ही मौजूदा ऋण दायित्वों को रीफाइनेंस करने के कंपनियों के व्यापक प्रयास शामिल हैं। ट्रेजरी एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब तक मार्केट के जरिए उधार लेने की लागत बैंकों द्वारा दी जाने वाली उधार दरों से कम रहेगी, तब तक इस तरह के बदलाव का ट्रेंड जारी रहने की संभावना है। इसके अलावा, कई कंपनियों ने भविष्य की मार्केट स्थितियों को देखते हुए अपनी कैश बफर बढ़ाने के लिए इस अवधि का उपयोग किया है।

लिक्विडिटी और RBI की पॉलिसी का रोल

बैंकिंग सिस्टम में फंड की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण सहायक कारक रही है। पूरे जून के दौरान, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने वेरिएबल रेट रेपो ऑक्शन के जरिए सिस्टम लिक्विडिटी को मैनेज किया, जिसमें स्थिरता बनाए रखने के लिए ₹6 लाख करोड़ से अधिक इंजेक्ट किए गए। जुलाई की शुरुआत तक, बैंकिंग सिस्टम में लगभग ₹1.85 लाख करोड़ का लिक्विडिटी सरप्लस दर्ज किया गया था। इस अनुकूल लिक्विडिटी माहौल ने कमर्शियल पेपर पर यील्ड को स्थिर बनाए रखा, जिससे वे कॉर्पोरेट ट्रेजरी विभागों के लिए एक सुलभ और कुशल साधन बन गए।

निवेशकों के लिए ध्यान देने योग्य बातें

निवेशकों के लिए, यह बदलाव दर्शाता है कि कई कंपनियां वर्तमान में लंबी अवधि के कर्ज का विस्तार करने के बजाय अपने ऋण की लागत को अनुकूलित करने पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। भविष्य में, मुख्य ध्यान इस बात पर रहेगा कि ब्याज दरों का यह अंतर कितना टिकाऊ है और वर्तमान लिक्विडिटी सरप्लस कब तक बना रहता है। यदि मार्केट में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो कंपनियों को यह रास्ता कम आकर्षक लग सकता है, जिससे उनकी शॉर्ट-टर्म वित्तीय लचीलेपन पर असर पड़ सकता है या उन्हें वापस बैंक उधार की ओर लौटना पड़ सकता है। मार्केट पार्टिसिपेंट्स यह भी देखेंगे कि यदि आने वाले महीनों में लिक्विडिटी की स्थिति टाइट होती है तो शॉर्ट-टर्म इंस्ट्रूमेंट्स पर यह बढ़ी हुई निर्भरता किसी रीफाइनेंसिंग चुनौती का कारण बनती है या नहीं।

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