भारतीय कंपनियों ने अगस्त महीने में विदेशी बाजारों से **$8.13 बिलियन** का कर्ज जुटाया है। यह पैसा मुख्य रूप से कैपिटल एक्सपेंशन और पुराने कर्ज को रिफाइनेंस करने के लिए लिया गया है, लेकिन निवेशकों को करेंसी रिस्क पर नजर रखनी चाहिए।
भारतीय कंपनियों का विदेशी बाजारों के प्रति आकर्षण लगातार बढ़ रहा है। अगस्त महीने में कुल एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ECB) फाइलिंग बढ़कर $8.13 बिलियन पर पहुंच गई है, जो जुलाई के $7.70 बिलियन के मुकाबले 5.6% ज्यादा है।\n\n### किन कंपनियों ने लिए सबसे बड़े लोन?\n\nइस फंडिंग राउंड में इंफ्रास्ट्रक्चर, रिटेल और एनर्जी सेक्टर की कंपनियों का दबदबा रहा है। Flipkart Internet ने इस सूची में बाजी मारी और $1.14 बिलियन का फंड जुटाया। वहीं, सरकारी कंपनियों में Power Finance Corporation, REC और Indian Oil Corporation जैसी बड़ी कंपनियों ने $500 मिलियन से $775 मिलियन के बीच फंड हासिल किए हैं। इनका इस्तेमाल नई क्षमता बढ़ाने और बिजनेस के आधुनिकीकरण में होगा।\n\n### क्यों विदेशी कर्ज की ओर झुकाव?\n\nकंपनियों के लिए विदेशी बाजार से कर्ज लेना कई बार घरेलू बैंकों की तुलना में सस्ता पड़ता है। Reliance Industries जैसी बड़ी कंपनियां इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से रिफाइनेंसिंग के लिए कर रही हैं, ताकि पुराने महंगे कर्ज को नए सस्ते कर्ज से बदलकर ब्याज का बोझ कम किया जा सके।\n\n### निवेशकों के लिए चेतावनी: करेंसी रिस्क\n\nविदेशी कर्ज में सबसे बड़ा रिस्क 'करेंसी फ्लक्चुएशन' का है। चूंकि यह लोन डॉलर में लिया जाता है, इसलिए अगर डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है, तो कंपनियों को कर्ज चुकाने के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे। इससे कंपनी का प्रॉफिट मार्जिन घट सकता है। \n\nनिवेशकों को सलाह है कि वे कंपनी की बैलेंस शीट में 'हेजिंग' (Hedging) की स्थिति जरूर देखें। यदि कंपनी ने अपने विदेशी कर्ज को सही ढंग से हेज नहीं किया है, तो रुपये की गिरावट सीधे उनके मुनाफे पर चोट करेगी। अपने पोर्टफोलियो की कंपनियों के क्वार्टरली नतीजों के दौरान मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखना बेहद जरूरी है।
