भारतीय कंपनियां अब 10 साल या उससे अधिक अवधि के लॉन्ग-टर्म बॉन्ड जारी करने पर जोर दे रही हैं। इंश्योरेंस और पेंशन फंड्स की बढ़ती मांग और सरकारी बॉन्ड की कम सप्लाई के चलते यह बदलाव देखने को मिल रहा है।
भारतीय कॉर्पोरेट जगत में फंडिंग को लेकर एक बड़ा रणनीतिक बदलाव देखने को मिल रहा है। कंपनियां अब शॉर्ट-टर्म के बजाय लंबे समय के लिए कर्ज जुटाने को प्राथमिकता दे रही हैं। इसके पीछे मुख्य वजह इंश्योरेंस कंपनियों और पेंशन फंड्स की ओर से 10 साल या उससे ज्यादा की मैच्योरिटी वाले बॉन्ड्स की तगड़ी डिमांड है।
क्यों बदल रही है रणनीति?
बाजार में शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म इंटरेस्ट रेट्स के बीच का गैप यानी 'यील्ड स्प्रेड' काफी कम हो गया है। इस स्थिति में कंपनियों के लिए लंबी अवधि के लिए फिक्स्ड रेट पर फंडिंग लॉक करना ज्यादा सुरक्षित और सस्ता साबित हो रहा है। इसके अलावा, केंद्र सरकार ने 30 से 50 साल वाले अल्ट्रा-लॉन्ग बॉन्ड्स की सप्लाई कम कर दी है, जिससे मार्केट में एक वैक्यूम (खाली जगह) बन गया है और अच्छी रेटिंग वाली कंपनियां इसे भरने के लिए आगे आ रही हैं।
मार्केट का मिजाज और आंकड़े
अगस्त 2026 के अंत तक, भारत में 10 साल के बॉन्ड की यील्ड लगभग 6.91% के स्तर पर थी। यह जून 2026 के बाद का उच्चतम स्तर है। हालांकि, एक्सपर्ट्स अभी इस बात पर बहस कर रहे हैं कि यह बदलाव परमानेंट है या सिर्फ मार्केट की मौजूदा परिस्थितियों का फायदा उठाने की एक कोशिश।
निवेशकों के लिए क्या है अहम?
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कंपनियों की यह रफ्तार तब भी बनी रहती है जब लिक्विडिटी की स्थिति सख्त हो जाए। निवेशकों को यह ट्रैक करना चाहिए कि कंपनियों के बैलेंस शीट पर इन लंबी अवधि के कर्ज का असर क्या होगा और क्या कंपनियां बढ़ती ब्याज दरों के माहौल में अपनी डेट-सर्विसिंग क्षमता को सुरक्षित रख पाएंगी।
