10-year सरकारी बॉन्ड यील्ड के **7.40%** तक पहुंचने और RBI द्वारा रेपो रेट को **5.50%** करने के बाद भारतीय कंपनियां अब बॉन्ड मार्केट से हटकर बैंक लोन को तरजीह दे रही हैं। नवंबर 2025 से अब तक हुए कुल क्रेडिट फ्लो में बैंकों की हिस्सेदारी **81%** रही है।
बढ़ती ब्याज दरों के चलते बॉन्ड मार्केट से फंड जुटाना कंपनियों के लिए महंगा सौदा साबित हो रहा है, जिसकी वजह से अब भारतीय कॉरपोरेट्स का रुख बैंकों की तरफ मुड़ गया है। 7 अक्टूबर, 2026 को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा रेपो रेट को 5.50% करने के बाद लिक्विडिटी में कसावट आई है और सरकारी बॉन्ड की यील्ड 7.40% के करीब पहुंच गई है।
बैंक लोन की मांग में तेजी
आंकड़ों पर गौर करें तो नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच बाजार में आए नए क्रेडिट फ्लो का 81% हिस्सा बैंकों के जरिए आया है। अगस्त 2026 तक कॉरपोरेट बैंक लोन में 22% की जोरदार ग्रोथ दर्ज की गई है, जो पिछले नवंबर में महज 11% थी। यह बदलाव न केवल बैंकों के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह भी बताता है कि हाई-इंटरेस्ट रेट के माहौल में कंपनियां अपने कर्ज को कैसे मैनेज कर रही हैं।
सेक्टर-विशिष्ट डिमांड और जोखिम
इस दौड़ में पावर, केमिकल और NBFC सेक्टर सबसे आगे हैं। इन उद्योगों को वर्किंग कैपिटल और प्रोजेक्ट्स के लिए लगातार फंडिंग की जरूरत होती है। हालांकि, निवेशकों को इस पर सतर्क रहने की जरूरत है। हाई इंटरेस्ट रेट्स से कंपनियों के नेट प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है, जिससे उनके एक्सपेंशन प्लान में देरी होने का खतरा बना हुआ है।
जानकारों का मानना है कि मार्च 2027 तक क्रेडिट ग्रोथ मॉडरेट होकर करीब 16% पर आ सकती है। निवेशकों को बैंकिंग संस्थानों की कमेंट्री और उनके एसेट क्वालिटी पर कड़ी नजर रखनी होगी, ताकि यह समझ सकें कि कंपनियां बढ़ती ब्याज दरों के बोझ को कैसे संभाल रही हैं।
