भारत की तीन बड़ी डेवलपमेंट फाइनेंस संस्थाएं (DFIs) - NaBFID, Nabard और Sidbi - जल्द ही विदेशी करेंसी लोन के ज़रिए कम से कम $1.5 बिलियन जुटाने की तैयारी में हैं। RBI की सपोर्ट वाली एक हेजिंग स्कीम का इस्तेमाल करके, ये संस्थाएं डॉलर बॉन्ड जारी करने की तुलना में कम ब्याज दर पर फंड जुटा सकेंगी। इस कदम से इंफ्रास्ट्रक्चर और डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के लिए लॉन्ग-टर्म फंडिंग को बढ़ावा मिलेगा, साथ ही करेंसी के उतार-चढ़ाव के रिस्क को भी मैनेज किया जा सकेगा।
क्या हुआ है?
भारत की तीन प्रमुख डेवलपमेंट फाइनेंस संस्थाएं (DFIs) – नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (Nabard), स्मॉल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया (Sidbi), और नेशनल बैंक फॉर फाइनेंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट (NaBFID) – इंटरनेशनल मार्केट्स का रुख कर रही हैं। ये संस्थाएं मिलकर विदेशी करेंसी लोन के ज़रिए कम से कम $1.5 बिलियन जुटाने की योजना बना रही हैं।
NaBFID इस कोशिश में सबसे आगे है और संभावित कर्जदाताओं के साथ बातचीत के एडवांस स्टेज में है। इसका लक्ष्य चालू फाइनेंशियल ईयर में $500 मिलियन से $2 बिलियन तक फंड जुटाना है। वहीं, Nabard और Sidbi अगले 30 से 40 दिनों में अपना फंड-रेज़िंग शुरू कर सकते हैं। डॉलर बॉन्ड्स की तुलना में, जिसमें ज़्यादा जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया होती है, ये संस्थाएं तेज़ी से फंड जुटाने के लिए बैंक लोन का विकल्प चुन रही हैं।
RBI की हेजिंग स्कीम की भूमिका
इस स्ट्रैटेजी का मुख्य हिस्सा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा दी जाने वाली एक विशेष सुविधा है। अमेरिकी डॉलर जैसी विदेशी करेंसी में लोन लेना आम तौर पर भारतीय कर्जदारों को करेंसी रिस्क (मुद्रा जोखिम) में डालता है – यानी, अगर रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो लोन चुकाना महंगा हो जाता है।
RBI ने एक्सटर्नल कमर्शियल बोरिंग्स (ECBs) के लिए सबसिडाइज्ड हेजिंग की एक स्कीम पेश की है। हेजिंग करेंसी में होने वाले उतार-चढ़ाव के खिलाफ एक बीमा पॉलिसी की तरह काम करती है। इस लागत पर सब्सिडी देकर, RBI प्रभावी रूप से इन संस्थाओं के लिए कुल खर्च को कम कर रहा है। NaBFID को उम्मीद है कि उसकी कुल उधार लेने की लागत 6.5% से 7% के बीच रहेगी, जो कि संस्था के लिए कैपिटल की ज़रूरतों को देखते हुए आकर्षक है।
डेवलपमेंट फाइनेंस के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?
ये DFIs भारतीय इकोनॉमी में खास भूमिका निभाते हैं। Nabard ग्रामीण विकास पर फोकस करता है, Sidbi छोटे और मध्यम उद्योगों को सपोर्ट करता है, और NaBFID लॉन्ग-टर्म इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को फाइनेंस करने के लिए समर्पित है। चूंकि इन प्रोजेक्ट्स के लिए भारी, लॉन्ग-टर्म कैपिटल की ज़रूरत होती है, इसलिए इन संस्थाओं को विविध फंडिंग स्रोतों की ज़रूरत है। विदेशी बाजारों में डेट (Debt) जुटाने से उन्हें केवल घरेलू स्रोतों की तुलना में कैपिटल का एक बड़ा पूल उपलब्ध होता है।
रिस्क को समझना
हालांकि RBI की हेजिंग स्कीम करेंसी प्रोटेक्शन की तत्काल लागत को कम करती है, निवेशकों को यह समझना चाहिए कि विदेशी उधार में अंतर्निहित जोखिम होते हैं। हेजिंग के बावजूद, उधार लेने की लागत ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स और मार्केट सेंटीमेंट से प्रभावित होती है। अगर ग्लोबल रेट्स बढ़ते हैं या विदेशी बाजारों में लिक्विडिटी (तरलता) कम होती है, तो भविष्य में उधार लेने की लागत बढ़ सकती है। इसके अलावा, हालांकि ये संस्थाएं सरकारी जनादेश द्वारा समर्थित हैं, लेकिन विदेशी कर्ज को मैनेज करने की उनकी क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि वे इन फंड्स को कितना प्रभावी ढंग से उन प्रॉफिटेबल या डेवलपमेंटल प्रोजेक्ट्स में लगा पाती हैं जो चुकाने के लिए ज़रूरी कैश फ्लो उत्पन्न कर सकें।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
ब्रोडर फाइनेंशियल सेक्टर को ट्रैक करने वालों के लिए, मुख्य बात इन लोन्स का वास्तविक निष्पादन (execution) होगी। निवेशकों को इन पर नज़र रखनी चाहिए:
- वह अंतिम लागत जिस पर ये संस्थाएं पैसा जुटाने में सक्षम होती हैं, जो बताता है कि RBI की सब्सिडी कितनी प्रभावी है।
- लोन कब फाइनल होते हैं, जिससे पता चलेगा कि ग्लोबल लेंडर्स का भारतीय DFI डेट के लिए कितना रुझान है।
- फंड्स के डिप्लॉयमेंट (उपयोग) के संबंध में किसी भी मैनेजमेंट कमेंट्री, जो स्पष्ट करेगा कि इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रामीण विकास का समर्थन करने के लिए इन अरबों का उपयोग कैसे किया जा रहा है।
