Auditor Rotation: कंपनियां अब ऑडिटर चुनने में बरत रहीं सख्ती, गवर्नेंस पर बढ़ा फोकस

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Auditor Rotation: कंपनियां अब ऑडिटर चुनने में बरत रहीं सख्ती, गवर्नेंस पर बढ़ा फोकस

कॉर्पोरेट बोर्ड्स अब ऑडिटर के चयन को लेकर बेहद सतर्क हो गए हैं। अनिवार्य रोटेशन के नियमों के बीच कंपनियां अब केवल नाम नहीं, बल्कि ऑडिट फर्मों की तकनीकी दक्षता और रेगुलेटरी ट्रैक रिकॉर्ड की गहन जांच कर रही हैं।

भारतीय कॉर्पोरेट जगत में स्टैट्यूटरी ऑडिटर (Statutory Auditor) चुनने का तरीका पूरी तरह बदल रहा है। अब ऑडिट कमेटियां केवल पुरानी साख के भरोसे नहीं रह गई हैं, बल्कि वे ऑडिट फर्मों की क्षमताओं का कड़ा परीक्षण कर रही हैं। चूंकि आने वाले फाइनेंशियल ईयर में कई ऑडिट मैंडेट्स समाप्त होने वाले हैं, इसलिए कंपनियां इस प्रक्रिया को किसी बड़े निवेश की तरह गंभीरता से ले रही हैं।

रेगुलेटर का दबाव और नई चुनौतियां

इस बदलाव के पीछे नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA) की सख्ती एक बड़ी वजह है। रेगुलेटर ने हाल ही में 35 सवालों का एक फ्रेमवर्क जारी किया है, जिससे कंपनियों को यह सुनिश्चित करने में मदद मिल रही है कि वे 'गोइंग कंसर्न' (Going Concern) बनी हुई हैं या नहीं। बोर्ड्स अब इन्हीं बेंचमार्क का उपयोग करके ऑडिट फर्मों से उनकी विशेषज्ञता साबित करने को कह रहे हैं।

ऑडिट और एडवाइजरी का अलगाव

कंपनियों के लिए सबसे बड़ा पेंच 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' (Conflict of Interest) को लेकर है। कई बड़ी कंपनियां अब ऐसी फर्मों से बच रही हैं जो ऑडिट के साथ-साथ टैक्स या कंसल्टिंग जैसी सेवाएं भी देती हैं। इसे रोकने के लिए कंपनियां अब समय से पहले डिस्क्लोजर मांग रही हैं ताकि इंडिपेंडेंस बरकरार रहे।

मार्केट कंसंट्रेशन का मुद्दा

रोटेशन के बावजूद, मार्केट में अभी भी कुछ बड़ी फर्मों का ही दबदबा है। शुरुआती 2026 के आंकड़ों के अनुसार, 'बिग सिक्स' फर्म्स अभी भी निफ्टी-500 की लगभग 66% कंपनियों का ऑडिट कर रही हैं। विकल्पों की कमी के कारण अक्सर बोर्ड्स के पास मोलभाव करने की शक्ति कम हो जाती है, जिससे ऑडिट कॉस्ट ऊपर बनी रहती है।

तकनीक ही नया पैमाना

अब केवल कागजी कार्रवाई काफी नहीं है। ऑडिट कमेटियां उन फर्मों को प्राथमिकता दे रही हैं जो डेटा एनालिटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बखूबी इस्तेमाल करती हैं। निवेशकों के लिए सलाह है कि वे कंपनी की एनुअल रिपोर्ट्स पर नजर रखें; अगर ऑडिट कमिटी ने चयन को लेकर सख्त रवैया अपनाया है, तो यह बेहतर गवर्नेंस का संकेत हो सकता है, लेकिन बार-बार ऑडिटर बदलना किसी बड़े विवाद का इशारा भी हो सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.