भारत में पैसेंजर व्हीकल के लिए औसत लोन साइज बढ़कर **₹8.2 लाख** पहुंच गया है, जो 2019 के मुकाबले **49%** अधिक है। महंगी गाड़ियों के दौर में ग्राहक अब **62 महीने** तक के लंबे लोन प्लान चुन रहे हैं।
बदलती आर्थिक आदतें
'Shifting Gears 2026' नाम की TransUnion CIBIL रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय ग्राहकों की कार खरीदने की आदतें तेजी से बदल रही हैं। साल 2026 की पहली छमाही में औसत लोन साइज ₹8.2 लाख दर्ज किया गया है। लोन चुकाने की औसत अवधि यानी टेन्योर (tenure) भी बढ़कर 62 महीने हो गई है, जो पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले 5 महीने ज्यादा है।
क्यों बढ़ रहा है लोन साइज?
इस बदलाव की मुख्य वजह ऑटो सेक्टर का 'प्रीमियम' होना है। लोग अब SUVs और हाई-फीचर वाली गाड़ियां पसंद कर रहे हैं, जिससे कारों की कीमतें बढ़ गई हैं। अपनी मंथली EMI को काबू में रखने के लिए ग्राहक लंबे समय के लिए कर्ज ले रहे हैं। हालांकि, इसका एक बड़ा नुकसान यह है कि कर्जदार को लोन की पूरी अवधि में काफी ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ता है। साथ ही 'नेगेटिव इक्विटी' का रिस्क भी बना रहता है, जहां गाड़ी की मार्केट वैल्यू लोन की बची हुई राशि से कम हो जाती है।
NBFCs का दबदबा
बाजार में NBFCs का बोलबाला बरकरार है। टू-व्हीलर लोन मार्केट में 73% और पैसेंजर व्हीकल लोन में 37% हिस्सेदारी NBFCs के पास है। अब आधे से ज्यादा बड़े कार लोन मेट्रो शहरों के बाहर से आ रहे हैं, जो छोटे कस्बों में क्रेडिट की बढ़ती मांग को दर्शाता है।
RBI का असर और चुनौती
अक्टूबर 2026 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने रेपो रेट बढ़ाकर 5.50% कर दिया है। इससे वेरिएबल रेट वाले लोन पर ब्याज बढ़ना तय है, जिसका सीधा असर EMI पर पड़ेगा। अब देखना यह होगा कि लंबी अवधि वाले ये लोन आगे चलकर NBFCs की एसेट क्वालिटी और कर्जदारों के रिपेमेंट पर कितना असर डालते हैं।
