भारतीय सरकारी बॉन्ड बिकवाली के दबाव में हैं क्योंकि राज्य सरकारें इस तिमाही में रिकॉर्ड **₹3.61 लाख करोड़** का कर्ज लेने की तैयारी कर रही हैं। इसी बीच RBI की मॉनेटरी पॉलिसी मीटिंग के चलते निवेशकों की नजरें ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी पर टिकी हैं।
बाजार पर उधारी का बोझ
भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार के लिए यह हफ्ता काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। निवेशकों के सामने दो बड़ी चिंताएं हैं: एक तरफ नए कर्ज की भारी सप्लाई है और दूसरी तरफ Reserve Bank of India (RBI) का ब्याज दरों पर आने वाला अहम फैसला। 5 से 7 अक्टूबर के बीच होने वाली मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक से पहले यह खबर आई है कि राज्य सरकारें मौजूदा अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में ₹3.61 लाख करोड़ का रिकॉर्ड कर्ज लेने वाली हैं।
क्यों बढ़ रही है यील्ड (Yield)?
बाजार में जब भारी मात्रा में नया डेट (Debt) आता है, तो बॉन्ड की कीमतों पर दबाव पड़ता है। बॉन्ड मार्केट का सीधा नियम है: जब कीमतें गिरती हैं, तो यील्ड बढ़ती है। यही कारण है कि बेंचमार्क 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड 7.20% से 7.21% के बीच पहुंच गई है, जो पिछले 2 साल का उच्चतम स्तर है। मांग की तुलना में सप्लाई ज्यादा होने से निवेशक अब ज्यादा रिटर्न की मांग कर रहे हैं।
RBI और इंफ्लेशन का गणित
मार्केट में चर्चा है कि RBI रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी कर सकता है, जो 2023 की शुरुआत के बाद पहली बार होगा। इसका सबसे बड़ा कारण रिटेल इंफ्लेशन है, जो क्रूड ऑयल की कीमतों के $100 प्रति बैरल से ऊपर रहने के कारण और भी विकराल हो गया है।
निवेशकों के लिए सबक
ब्याज दरें बढ़ने का सीधा मतलब है पुराने बॉन्ड की वैल्यू का कम होना। इससे न केवल सरकारी उधारी महंगी होगी, बल्कि कंपनियों और आम आदमी के लिए भी लोन लेना महंगा हो जाएगा। अब सबकी नजरें RBI की मीटिंग के बाद आने वाले आधिकारिक बयान पर हैं। अगर RBI का रुख 'हॉकिश' (सख्त) रहता है, तो बॉन्ड यील्ड में और अस्थिरता देखने को मिल सकती है।
