भारतीय बैंक अब माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) को लोन देने में ज्यादा सतर्क हो रहे हैं। हाल के आंकड़ों के अनुसार, MSME सेक्टर में क्रेडिट ग्रोथ घटकर **12.7%** पर आ गई है, और लोन की किश्तें चुकाने में देरी के मामले भी बढ़ रहे हैं।
क्या हुआ है?
भारतीय बैंकों ने MSME सेक्टर के लिए लोन देने के मामले में अपना रुख और सख्त कर लिया है। अप्रैल के आंकड़ों के मुताबिक, इस सेगमेंट में क्रेडिट ग्रोथ पिछले कुछ तिमाहियों के 18% से 20% की तेज बढ़ोतरी के मुकाबले घटकर 12.7% सालाना रह गई है। यह गिरावट लोन की एक्टिव संख्या में भी साफ दिख रही है, जो पहले के मुकाबले सिर्फ 2.5% बढ़ी है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों से पता चलता है कि MSME को दिया गया कुल लोन मार्च में ₹15 लाख करोड़ से घटकर फिलहाल ₹14.49 लाख करोड़ पर स्थिर हो गया है। इसी को देखते हुए बैंक अब नए लोन मंजूर करने से पहले अपनी आंतरिक जांच को मजबूत कर रहे हैं और ज्यादा सख्त मानक अपना रहे हैं।
बैंकों के लिए एसेट क्वालिटी क्यों मायने रखती है?
बैंकों में डिफ्लिंकुएंसी रेट (डिफॉल्टर यानी लोन की किश्तें चुकाने में देरी करने वाले ग्राहकों की संख्या) में शुरुआती बढ़ोतरी देखी जा रही है। आंकड़ों के अनुसार, 31 से 90 दिनों की देरी वाले लोन बढ़कर 1.8% हो गए हैं, जबकि 90 दिनों से ज्यादा की देरी वाले लोन 7.8% तक पहुंच गए हैं।
यह बदलाव बैंकिंग सेक्टर में एक जैसा नहीं है। सरकारी बैंकों (Public Sector Banks) में निजी बैंकों (Private Sector Banks) की तुलना में यह समस्या ज्यादा देखने को मिल रही है, जहां शुरुआती डिफ्लिंकुएंसी 3% तक बढ़ गई है। निवेशकों के लिए यह एक अहम बात है, क्योंकि क्रेडिट कॉस्ट (यानी लोन के नुकसान के लिए बैंकों को अलग रखना पड़ने वाला पैसा) सीधे बैंक की प्रॉफिटेबिलिटी और रिटर्न ऑन एसेट्स को कम कर सकता है।
तनाव के पीछे के कारण
बाहरी कारक छोटे व्यवसायों की लोन चुकाने की क्षमता पर दबाव डाल रहे हैं। ग्लोबल सप्लाई चेन में आई रुकावटें और लागत में बढ़ोतरी, जिसका एक कारण पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष भी है, छोटे फर्मों के मार्जिन को प्रभावित कर रही हैं। टेक्सटाइल, केमिकल और ऑटो कंपोनेंट जैसे सेक्टर की कंपनियां इन लागत दबावों के प्रति ज्यादा संवेदनशील दिख रही हैं। बैंक अब इन इंडस्ट्रीज पर बारीकी से नजर रख रहे हैं कि क्या यह वर्तमान तनाव सिर्फ एक अस्थायी झटका है या डिफॉल्ट के गहरे चक्र का संकेत है।
सरकारी सहायता की भूमिका
जहां बैंक सतर्क हैं, वहीं कुछ सहायता तंत्र भी मौजूद हैं। सरकार समर्थित योजनाएं जैसे क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज (CGTMSE) और इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ECLGS) एक सपोर्ट के रूप में काम कर रही हैं। ये योजनाएं कर्जदाताओं को एक सुरक्षा जाल प्रदान करती हैं, जिससे जोखिम को मैनेज करने में मदद मिलती है। हालांकि, यह तथ्य कि कुछ कंपनियां एहतियात के तौर पर इन सुविधाओं का लाभ उठा रही हैं, छोटे व्यवसाय क्षेत्र में अनिश्चितता के सामान्य माहौल को उजागर करता है।
निवेशकों को आगे क्या देखना चाहिए?
निवेशकों के लिए, सबसे महत्वपूर्ण बात उन बैंकों के तिमाही नतीजों पर नजर रखना होगा जिनका MSME सेगमेंट में बड़ा एक्सपोजर है। विशेष रूप से, अर्निंग कॉल्स में क्रेडिट कॉस्ट और एसेट क्वालिटी के ट्रेंड्स पर अपडेट देखें। अगर डिफ्लिंकुएंसी बढ़ती रहती है, तो बैंक अपने लोन बुक में ग्रोथ को सीमित करते हुए, लोन देने के प्रति अपना सतर्क रुख बनाए रख सकते हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि निजी या सरकारी बैंक इन क्रेडिट कॉस्ट को कितनी प्रभावी ढंग से कंट्रोल कर पाते हैं, ताकि उनके भविष्य के प्रदर्शन का आकलन किया जा सके।
