RBI के कदम से सस्ता हुआ विदेशी पैसा, भारतीय बैंक रोके CDs जारी, जानिए पूरा मामला

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
RBI के कदम से सस्ता हुआ विदेशी पैसा, भारतीय बैंक रोके CDs जारी, जानिए पूरा मामला

भारतीय बैंकों ने शॉर्ट-टर्म डेट (Debt) बेचना लगभग बंद कर दिया है। इसकी जगह, वे अब RBI की पॉलिसी से प्रोत्साहित होकर विदेशी मुद्रा वाले डिपॉजिट्स (Foreign-currency deposits) की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इन डिपॉजिट्स की लागत काफी कम है, जबकि क्रेडिट की मांग को पूरा करने के लिए डिपॉजिट ग्रोथ (Deposit growth) कम पड़ रही है।

क्यों बैंकों ने रोकी CDs जारी करना?

भारतीय कमर्शियल बैंकों ने जुलाई की शुरुआत में सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CDs) पर अपनी निर्भरता काफी कम कर दी है। Clearing Corp. of India के आंकड़ों के मुताबिक, 2 जुलाई तक के तीन ट्रेडिंग सेशन में कोई भी नई CD जारी नहीं हुई। यह पिछले महीने के मुकाबले एक बड़ा बदलाव है, जब बैंकों ने टाइट लिक्विडिटी (Liquidity) को मैनेज करने के लिए जून के पहले हाफ में ही लगभग 1 ट्रिलियन रुपये जुटाए थे।

फंड जुटाने की स्ट्रेटेजी में बड़ा बदलाव

इस बदलाव की मुख्य वजह रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) का वो हालिया फैसला है, जिसमें उसने विदेशी डॉलर बॉरोइंग (Overseas dollar borrowings) पर हेजिंग कॉस्ट (Hedging costs) को एब्जॉर्ब (Absorb) करने का ऐलान किया है। करेंसी में उतार-चढ़ाव से बचाव की लागत को खत्म करके, RBI ने फॉरेन-करेंसी डिपॉजिट्स को डोमेस्टिक डेट (Domestic debt) का एक बहुत ही कंपीटिटिव (Competitive) और सस्टेनेबल (Sustainable) विकल्प बना दिया है। बैंक अब इन इनफ्लोज (Inflows) को प्राथमिकता दे रहे हैं, बजाय CD इश्यू करने के। दरअसल, मजबूत क्रेडिट ग्रोथ को फंड करने के लिए डोमेस्टिक रिटेल और कॉर्पोरेट डिपॉजिट्स को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण CDs महंगी हो गई हैं।

बाजार के जानकारों का मानना है कि यह ट्रेंड सितंबर तक जारी रह सकता है। RBI की इस पहल से बैंकिंग सिस्टम में $50 बिलियन से ज्यादा पैसा आने की उम्मीद है। लेंडर्स (Lenders) को लग रहा है कि फॉरेन-करेंसी डिपॉजिट्स से ज्यादा स्टेबल (Stable) और कॉस्ट-इफेक्टिव (Cost-effective) कैश फ्लो मिलेगा। इस इनफ्लक्स का असर शॉर्ट-टर्म बॉरोइंग कॉस्ट (Borrowing costs) पर पहले ही दिखने लगा है। एक साल की CD रेट्स में भारी गिरावट आई है, जो मई में 7.96% के पीक (Peak) से गिरकर हाल ही में 6.84% पर आ गई हैं। कुछ इंडस्ट्री ऑब्जर्वर्स (Observers) को उम्मीद है कि जैसे-जैसे बैंक सस्ते फॉरेन कैपिटल (Capital) को प्राथमिकता देते रहेंगे, इन रेट्स में 20 से 25 बेसिस पॉइंट्स की और गिरावट आ सकती है।

बैंक की प्रॉफिटेबिलिटी पर असर

बैंकिंग स्टॉक्स (Banking stocks) के लिए यह डेवलपमेंट इसलिए अहम है क्योंकि फंड की लागत (Cost of funds) नेट इंटरेस्ट मार्जिन्स (Net interest margins) का एक बड़ा ड्राइवर होती है। जब बैंक भारी मात्रा में CDs पर निर्भर करते हैं, तो उन फंड्स को अट्रैक्ट करने के लिए लगने वाली ऊंची ब्याज दरों के कारण उनके मार्जिन्स पर दबाव आता है। महंगी लोकल डेट की जगह ज्यादा किफायती फॉरेन-करेंसी डिपॉजिट्स का इस्तेमाल करके, बैंक लोन ग्रोथ की तुलना में डिपॉजिट ग्रोथ की चुनौती के बावजूद अपनी प्रॉफिटेबिलिटी को बचा सकते हैं या सुधार सकते हैं।

हालांकि, मौजूदा माहौल बैंकों के बैलेंस शीट्स (Balance sheets) के लिए सपोर्टिव है, लेकिन इस फंडिंग सोर्स की लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी (Sustainability) एक अहम मॉनिटरेबल (Monitorable) बनी हुई है। बैंकों के लिए मुख्य जोखिम लिक्विडिटी की कंडीशंस पर निर्भरता है; अगर RBI अपना रुख बदलता है और सिस्टम से आक्रामक रूप से लिक्विडिटी को एब्जॉर्ब करना शुरू कर देता है, तो CD रेट्स तेजी से बढ़ सकती हैं। इसके अलावा, RBI की हेजिंग सपोर्ट के बावजूद, बैंकों को ग्लोबल इंटरेस्ट रेट वोलेटिलिटी (Volatility) से जुड़े जोखिमों को मैनेज करना होगा। निवेशकों को भविष्य के तिमाही डिस्क्लोजर्स (Disclosures) पर नजर रखनी चाहिए कि क्या यह बदलाव आने वाले अर्निंग साइकल्स (Earnings cycles) में इंटरेस्ट एक्सपेंस (Interest expenses) को सफलतापूर्वक कम करता है और मार्जिन्स को स्टेबल करता है।

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