भारतीय बैंकों ने शॉर्ट-टर्म फंड जुटाने के लिए सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CD) का सहारा कम कर दिया है। अगस्त में यह आंकड़ा गिरकर **₹68,130 करोड़** के चार महीने के निचले स्तर पर आ गया है।
अगस्त 2026 में भारतीय बैंकिंग सिस्टम में शॉर्ट-टर्म उधारी में बड़ी सुस्ती देखी गई है। डेटा के अनुसार, बैंकों ने सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CD) के जरिए मात्र ₹68,130 करोड़ जुटाए हैं, जो अप्रैल 2026 के बाद का सबसे कम स्तर है।
क्यों कम हुई उधारी?
इस सुस्ती की सबसे बड़ी वजह बैंकिंग सिस्टम में मौजूद भारी नकदी है, जो अगस्त के अंत तक लगभग ₹6.65 लाख करोड़ तक पहुंच गई थी। बैंकों को FCNR(B) स्कीम के जरिए एक सस्ता विकल्प मिल गया है। Reserve Bank of India (RBI) की स्पेशल स्वैप फैसिलिटी का फायदा उठाकर बैंकों ने $65.4 बिलियन विदेशी मुद्रा जुटाई है, जिससे उन्हें महंगे मार्केट से फंड लेने की जरूरत नहीं पड़ी।
प्रमुख बैंकों का रुख
HDFC Bank, Bank of Baroda, Canara Bank और Central Bank of India जैसे बड़े कर्जदाताओं ने अपनी पुरानी उधारी को रोलओवर करने के बजाय अपने डिपॉजिट बफर से चुकाने का फैसला किया। निवेशकों के लिए यह अच्छी खबर है क्योंकि इससे बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव कम होगा और मुनाफा सुरक्षित रहेगा।
आगे क्या होगा?
बाजार की नजर अब अक्टूबर और RBI की अगली पॉलिसी पर है। अगर RBI बढ़ती महंगाई को देखते हुए लिक्विडिटी को कम करने का फैसला करता है, तो बैंकों की फंडिंग कॉस्ट फिर से बढ़ सकती है। सितंबर में करीब ₹1.83 लाख करोड़ की मैच्योरिटी है, लेकिन सिस्टम में सरप्लस नकदी के कारण इसके आसानी से मैनेज होने की उम्मीद है। निवेशकों को RBI के लिक्विडिटी स्टैंस पर खास नजर रखनी होगी।
