Canara Bank और Punjab National Bank जैसे बड़े बैंकों ने फिलहाल अपना **$2.5 बिलियन** का विदेशी फंड जुटाने का प्लान टाल दिया है। अमेरिकी ब्याज दरों में बढ़ोतरी और हेजिंग (Hedging) की बढ़ती लागत के चलते घरेलू बाजार में कर्ज लेना अब सस्ता पड़ रहा है।
बढ़ती ग्लोबल अनिश्चितता और महंगी हो रही डॉलर फंडिंग के बीच भारतीय बैंकों ने एक बड़ा रणनीतिक फैसला लिया है। Canara Bank, Punjab National Bank और Bank of India जैसे प्रमुख सरकारी बैंकों ने $2.5 बिलियन के डॉलर-डिनोमिनेटेड बॉन्ड के जरिए पूंजी जुटाने की प्रक्रिया पर ब्रेक लगा दिया है।
क्यों महंगा हुआ विदेशी कर्ज?
इस फैसले के पीछे मुख्य वजह अमेरिकी ट्रेजरी दरों का 5% के स्तर की ओर बढ़ना है। जब बैंक डॉलर में कर्ज लेते हैं, तो उन्हें करेंसी में उतार-चढ़ाव से बचने के लिए हेजिंग करानी पड़ती है। रुपये में कमजोरी के कारण यह सुरक्षा लागत (Hedging cost) काफी बढ़ गई है। स्थिति यह है कि अब डॉलर में उधार लेना, घरेलू स्तर पर पैसा जुटाने की तुलना में 70 से 100 बेसिस पॉइंट्स यानी करीब 1% तक महंगा साबित हो रहा है।
RBI की स्कीम और आगे की राह
बैंक फिलहाल Reserve Bank of India की सब्सिडाइज्ड हेजिंग विंडो की स्थिति का आकलन कर रहे हैं। यह सुविधा दिसंबर में समाप्त होने वाली है। अब तक पब्लिक सेक्टर बैंकों ने इस स्कीम के जरिए करीब $3.5 बिलियन जुटाए हैं। वर्तमान बाजार में अस्थिरता को देखते हुए, बैंकों की ट्रेजरी टीम अब लंबी अवधि के महंगे डॉलर लोन के बजाय घरेलू लिक्विडिटी पर ज्यादा भरोसा जता रही है।
निवेशकों के लिए यह एक संकेत है कि बैंक अपनी बैलेंस शीट को लेकर बेहद सतर्क हैं। वे ग्लोबल मार्केट की वोलेटिलिटी को अपने प्रॉफिट मार्जिन पर हावी नहीं होने देना चाहते। आने वाले समय में बैंक अपनी कैपिटल जरूरतों को पूरा करने के लिए डिपॉजिट ग्रोथ और स्थानीय बॉन्ड इश्यू पर अधिक फोकस रखेंगे।
