Indian Banks: लिक्विडिटी की किल्लत? RBI से बड़ी मांग, जानें वजह!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Indian Banks: लिक्विडिटी की किल्लत? RBI से बड़ी मांग, जानें वजह!
Overview

इंडियन बैंकों के सामने फंड की कमी का संकट मंडरा रहा है! डिपॉजिट (Deposit) की तुलना में क्रेडिट ग्रोथ (Credit Growth) काफी तेज होने के कारण बैंकों के पास लोन देने के लिए पैसे कम पड़ रहे हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि लोग अपना पैसा बैंक डिपॉजिट के बजाय स्टॉक मार्केट (Stock Market) और अन्य इक्विटी (Equity) वाली जगहों पर लगा रहे हैं। अब इंडियन बैंक्स, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) से लिक्विडिटी (Liquidity) बढ़ाने वाले नियमों में ढील देने की मांग कर रहे हैं।

फंड की कमी के पीछे की कहानी

RBI के जनवरी 2026 के आंकड़े बताते हैं कि बैंकों का क्रेडिट 13.5% सालाना की दर से बढ़ रहा है, जबकि डिपॉजिट ग्रोथ (Deposit Growth) सिर्फ 10.8% है। यह बड़ा अंतर इस बात का इशारा है कि लोग अपना पैसा अब बैंकों में रखने की बजाय शेयर बाजार (Share Market) और दूसरे मार्केट-लिंक्ड इन्वेस्टमेंट (Market-linked Investments) में लगा रहे हैं। इस वजह से बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो गया है। तीन महीने के सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (Certificate of Deposit) पर ब्याज दरें लगभग 7% तक पहुंच गई हैं, जो सरकारी ट्रेजरी बिल (Treasury Bill) से काफी ज्यादा है।

बैंकों के बड़े प्रस्ताव

इस फंड की कमी को दूर करने के लिए, इंडियन बैंकों ने RBI के सामने कुछ खास मांगें रखी हैं। सबसे बड़ा प्रस्ताव यह है कि बैंकों को अपना कुछ अनिवार्य कैश रिजर्व रेशियो (CRR) RBI के पास रखना होता है। बैंक चाहते हैं कि इस CRR फंड का कुछ हिस्सा लिक्विडिटी कवरेज रेशियो (LCR) की गणना में शामिल करने की इजाजत मिले। इससे बैंकों के पास तुरंत लोन देने के लिए ज्यादा फंड उपलब्ध हो जाएगा। इसके अलावा, बैंक सरकार की नई बॉन्ड (Bond) नियमों को जल्दी लागू करने की भी मांग कर रहे हैं, जिससे वे कम सरकारी बॉन्ड रख सकें। एक और प्रस्ताव है कि इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड (Infrastructure Bond) की न्यूनतम मैच्योरिटी अवधि (Maturity Period) को सात साल से घटाकर पांच साल कर दिया जाए, ताकि उन्हें फंड जुटाने में आसानी हो।

RBI के सामने बड़ी चुनौती

अब देखना यह है कि RBI इन मांगों पर कैसे प्रतिक्रिया देता है। एक तरफ, लिक्विडिटी (Liquidity) के नियमों में ढील देने से इकोनॉमी (Economy) को बूस्ट मिल सकता है, क्योंकि लोन का फ्लो बना रहेगा। वहीं, दूसरी तरफ RBI को वित्तीय स्थिरता (Financial Stability) का भी ध्यान रखना होगा। आमतौर पर, RBI लिक्विडिटी को मैनेज करने के लिए ओपन मार्केट ऑपरेशन्स (Open Market Operations) जैसे टूल का इस्तेमाल करता है, न कि नियमों को बड़े पैमाने पर बदलने का। इक्विटी (Equity) की ओर शिफ्ट होने वाला यह ट्रेंड एक स्ट्रक्चरल (Structural) चुनौती है, न कि सिर्फ अस्थायी लिक्विडिटी क्रंच (Liquidity Crunch)। अगर CRR या LCR जैसे नियमों में ढील दी जाती है, तो असेट-लायबिलिटी मिसमैच (Asset-Liability Mismatch) का जोखिम बढ़ सकता है। ऐसे में, NIFTY Bank इंडेक्स (Index) में अभी ज्यादा हलचल नहीं दिख रही है, जो निवेशकों की सावधानी को दर्शाता है। एनालिस्ट (Analyst) भी बंटे हुए हैं; कुछ RBI से ग्रोथ को सपोर्ट करने की उम्मीद कर रहे हैं, तो कुछ वित्तीय सिस्टम की स्थिरता को लेकर चिंतित हैं।

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