भारतीय बैंकों में ग्राहकों के पैसे रखने का तरीका बदल रहा है। CRISIL की रिपोर्ट के मुताबिक, फाइनेंशियल ईयर 2026 तक फिक्स्ड डिपॉजिट (Term Deposits) में कुल जमा राशि का **61%** हिस्सा पहुंच गया है, जो 2019 में सिर्फ **58%** था। इस बदलाव के कारण बैंकों के लिए सस्ता फंड जुटाना मुश्किल हो रहा है और उनकी लोन दरें कम रखने की क्षमता पर दबाव बन रहा है।
जानिए क्या हुआ है?
भारतीय बैंकिंग सेक्टर में ग्राहकों के पैसे रखने के तरीके में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। CRISIL की एक रिपोर्ट बताती है कि फाइनेंशियल ईयर 2026 में, फिक्स्ड डिपॉजिट (जिन्हें टर्म डिपॉजिट्स भी कहते हैं) अब बैंकों में कुल जमा राशि का 61% हिस्सा बन गए हैं। यह सात साल पहले, यानी फाइनेंशियल ईयर 2019 के 58% के मुकाबले एक बड़ी बढ़ोतरी है।
इसके विपरीत, करंट अकाउंट और सेविंग्स अकाउंट (CASA) में रखे पैसों का हिस्सा घटकर 39% रह गया है, जो सात साल पहले 42% था। बैंकों के लिए CASA फंड का एक सस्ता जरिया माना जाता है क्योंकि इन अकाउंट्स पर बहुत कम ब्याज मिलता है। जब CASA का हिस्सा घटता है, तो बैंकों को अपने लोन देने के कारोबार को फंड करने के लिए महंगे टर्म डिपॉजिट्स पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ता है।
बैंक के मुनाफे पर क्यों पड़ रहा है असर?
किसी भी बैंक के लिए फंड की लागत (Cost of Funds) उसके मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा होती है। जब ग्राहक कम ब्याज वाले सेविंग्स अकाउंट से ज्यादा ब्याज वाले टर्म डिपॉजिट्स में पैसा ट्रांसफर करते हैं, तो बैंक का ब्याज खर्च बढ़ जाता है। अगर बैंक इस बढ़े हुए खर्च को अपने उधारकर्ताओं से ज्यादा ब्याज वसूल कर पास ऑन नहीं कर पाता, तो बैंक का नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) - यानी लोन पर कमाई और जमा पर भुगतान के बीच का अंतर - दबाव में आ जाता है।
यह बदलाव बैंकों की कम लागत पर काम करने की क्षमता को सीमित करता है। मौजूदा माहौल में, यह ट्रेंड बताता है कि बैंकों को डिपॉजिट्स को आकर्षित करने और बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है और ज्यादा भुगतान करना पड़ रहा है, क्योंकि रिटेल ग्राहक अपनी बचत पर बेहतर रिटर्न की तलाश में हैं।
प्राइवेट बैंक बनाम सरकारी बैंक
इस बदलाव का असर पूरे इंडस्ट्री में एक जैसा नहीं है। प्राइवेट सेक्टर के बैंकों ने अपने CASA रेश्यो में ज्यादा गिरावट देखी है, जो फाइनेंशियल ईयर 2026 में 38% पर आ गया, जबकि 2019 में यह 42% था। सरकारी बैंकों ने इस दौरान अपने CASA रेश्यो में 41% से घटकर 39% होने के साथ अपेक्षाकृत स्थिर प्रदर्शन किया है।
प्राइवेट सेक्टर में इस अंतर का एक कारण HDFC Ltd और HDFC Bank का 2024 में हुआ बड़ा मर्जर भी है, जिसने संयुक्त इकाई की देनदारी प्रोफाइल को बदल दिया और इंडस्ट्री के औसत को प्रभावित किया।
रेपो रेट और डिपॉजिट रेट का अंतर
डिपॉजिट लागत को मैनेज करने की मुश्किल केंद्रीय बैंक की पॉलिसी दरों में बदलाव पर बैंकों की प्रतिक्रिया में भी दिखती है। फरवरी 2025 और मार्च 2026 के बीच, रेपो रेट में कुल 125 बेसिस पॉइंट्स की कमी आई। हालांकि, बैंकों ने नए टर्म डिपॉजिट्स पर अपनी दरें केवल लगभग 48 बेसिस पॉइंट्स कम कीं। यह अंतर बताता है कि बैंक तुरंत दरें कम करने के बजाय डिपॉजिट ग्रोथ और स्थिरता को प्राथमिकता दे रहे हैं, ताकि उन बचत को बनाए रख सकें जो तेजी से म्यूचुअल फंड और इक्विटी जैसे अन्य वित्तीय साधनों की ओर जा रही हैं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
बैंकों के प्रदर्शन पर नजर रखने वाले निवेशकों को लोन ग्रोथ के आंकड़ों से आगे देखना चाहिए। आने वाली तिमाहियों के लिए, फंड की लागत और NIMs की चाल पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
- मार्जिन स्थिरता: यह देखें कि क्या बैंक बढ़ती डिपॉजिट लागत के बावजूद अपने मार्जिन को बनाए रख पाते हैं।
- लायबिलिटी मिक्स: बैंक के मैनेजमेंट से जानें कि CASA रेश्यो को बेहतर बनाने या महंगी टर्म डिपॉजिट्स की ग्रोथ को मैनेज करने की उनकी क्या रणनीति है।
- एसेट-लायबिलिटी मैनेजमेंट: इस बात पर ध्यान दें कि क्या बैंक लागतों को अपने ग्राहकों पर डाल पा रहे हैं या वे डिपॉजिट्स पर ऊंची ब्याज दरों के दबाव को खुद झेल रहे हैं।
