भारतीय बैंकों की **21.1%** डिपॉजिट ग्रोथ के पीछे FCNR(B) स्वैप विंडो का बड़ा हाथ है। बिना इस सुविधा के, घरेलू डिपॉजिट ग्रोथ केवल **12.2%** रही है, जो बैंकिंग सेक्टर में लिक्विडिटी के दबाव का संकेत देती है।
सितंबर तिमाही के नतीजों में बैंकिंग सेक्टर की ग्रोथ का एक 'छुपा हुआ' सच सामने आया है। बैंकों ने जो 21.1% की डिपॉजिट ग्रोथ दिखाई है, वह पूरी तरह ऑर्गेनिक नहीं है। इसमें बड़ा योगदान Reserve Bank of India (RBI) की स्पेशल FCNR(B) स्वैप विंडो का है। यदि इस टेंपरेरी फॉरेन करेंसी इनफ्लो को हटा दिया जाए, तो घरेलू डिपॉजिट की असल ग्रोथ केवल 12.2% रह जाती है।
आंकड़ों का मायाजाल
यह 9% का अंतर बताता है कि बैंकों ने कोर डिपॉजिट जुटाने की सुस्त रफ्तार को छिपाने के लिए रेगुलेटरी सुविधाओं का सहारा लिया है। यही स्थिति क्रेडिट डिस्बर्समेंट में भी दिख रही है। हेडलाइन क्रेडिट ग्रोथ 24.2% है, लेकिन स्वैप फैसिलिटी से जुड़े लोन हटाने पर यह घटकर 18.9% रह जाती है। इसका साफ मतलब है कि CASA (करंट अकाउंट-सेविंग अकाउंट) डिपॉजिट्स, एसेट विस्तार की तुलना में पीछे छूट रहे हैं।
बैंकों पर कितना असर?
स्वैप विंडो का असर हर बैंक पर अलग-अलग रहा है। RBL Bank पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा, जिसकी डिपॉजिट ग्रोथ स्वैप इनफ्लो हटाने के बाद 34% से गिरकर महज 6% रह गई। वहीं, ICICI Bank की ग्रोथ 27.1% से घटकर 17% और Kotak Mahindra Bank की 23.2% से घटकर 13% रह गई। HDFC Bank ने बेहतर मजबूती दिखाई, फिर भी इसकी ग्रोथ में 4% का हिस्सा इसी फैसिलिटी का था।
निवेशकों के लिए चेतावनी
अगस्त में स्वैप विंडो बंद होने के बाद, बैंक अब जमा किए गए $133 बिलियन को लेंडिंग और महंगी होलसेल उधारी चुकाने में लगा रहे हैं। हालांकि, क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो 81.6% के ऊंचे स्तर पर है, जो लिक्विडिटी की तंगी को दर्शाता है। अगर आने वाली तिमाहियों में बैंकों ने अपना ऑर्गेनिक डिपॉजिट नहीं बढ़ाया, तो उन्हें महंगी फंडिंग पर निर्भर रहना पड़ेगा, जिससे उनके नेट इंटरेस्ट मार्जिन पर गहरा असर पड़ सकता है।
