Indian Banks Asset Quality: 20 तिमाहियों की तेजी के बाद सुधार की रफ्तार धीमी, अब रिटेल लोन पर फोकस

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AuthorAditya Rao|Published at:
Indian Banks Asset Quality: 20 तिमाहियों की तेजी के बाद सुधार की रफ्तार धीमी, अब रिटेल लोन पर फोकस

भारतीय बैंकिंग सेक्टर के लिए एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पिछले **20 तिमाहियों** से लगातार सुधर रही एसेट क्वालिटी (Asset Quality) की रफ़्तार अब धीमी पड़ गई है। इसका सीधा मतलब है कि पुराने बैड लोन (Bad Loans) को ठीक करने का दौर लगभग खत्म हो चुका है।

पुराने NPA की सफाई खत्म, अब नई चुनौती

पिछले कई सालों से भारतीय बैंक पुराने स्ट्रेस्ड एसेट्स (Stressed Assets) को सुलझाने, रिकवरी बढ़ाने और सावधानी से लोन देने की वजह से अपनी एसेट क्वालिटी में लगातार सुधार कर रहे थे। CareEdge Ratings के मुताबिक, अब ये सफाई का फेज लगभग पूरा हो गया है। अब बैंकों को नए लोन डिफॉल्ट्स (Loan Defaults) को संभालने और आने वाले समय में 'एक्सपेक्टेड क्रेडिट लॉस' (Expected Credit Loss - ECL) अकाउंटिंग के नियमों के लिए तैयार रहने पर ध्यान देना होगा।

रिटेल लोन में बढ़ती चिंता

पुराने बैड लोन को या तो सुलझा लिया गया है या राइट-ऑफ (Write-off) कर दिया गया है, जिसकी वजह से NPA (Non-Performing Asset) में कमी लाने का आसान रास्ता अब खत्म हो गया है। अब बैंक नए स्लिपेज (Slippages) यानी हाल-फ़िलहाल में बैड हुए लोन से जूझ रहे हैं। चालू फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) की पहली तिमाही में, प्राइवेट बैंकों के लिए नए स्लिपेज में 15.4% का इजाफा हुआ है, जो पिछले क्वार्टर के ₹24,000 करोड़ से बढ़कर ₹28,000 करोड़ हो गया है। एनालिस्ट्स का मानना है कि यह बढ़ोतरी क्रेडिट क्वालिटी में व्यापक गिरावट के बजाय व्हीकल और ट्रैक्टर फाइनेंस जैसे सीजनल फैक्टर्स के कारण हुई है।

दूसरी ओर, पब्लिक सेक्टर बैंकों (Public Sector Banks) में नए स्लिपेज पिछले साल की इसी अवधि के ₹15,000 करोड़ से घटकर ₹13,000 करोड़ रह गए। यह दिखाता है कि पब्लिक सेक्टर बैंक अभी भी पुराने सुधारों के असर से निकल रहे हैं, जबकि प्राइवेट बैंक अपने रिटेल बुक्स में हो रहे उतार-चढ़ाव को संभाल रहे हैं।

बैंकिंग सेक्टर की मौजूदा हालत

सुधार की गति भले ही धीमी हो गई हो, लेकिन भारतीय बैंकिंग सिस्टम की सेहत अभी भी मजबूत बनी हुई है। नेट एनपीए (Net NPA) रेशियो पिछले 6 तिमाहियों से ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर 0.40% पर बना हुआ है। यह दर्शाता है कि बैंक संभावित नुकसान के लिए अच्छी तरह से प्रोविजन (Provision) किए हुए हैं। ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (GNPA) रेशियो में भी काफी सुधार हुआ है। प्राइवेट बैंकों का औसत 1.45% रहा, जो पिछले साल 1.84% था, और पब्लिक सेक्टर बैंकों का औसत 1.87% रहा, जो पिछले साल 2.53% था।

निवेशकों के लिए आगे क्या?

आगे चलकर, इस सेक्टर के लिए सबसे बड़ी चिंता अनसिक्योर्ड रिटेल लोन (Unsecured Retail Loans) जैसे पर्सनल क्रेडिट (Personal Credit) और माइक्रोफाइनेंस (Microfinance) को मैनेज करना है। जैसे-जैसे आर्थिक हालात बदलते हैं, ये सेगमेंट्स सबसे पहले स्ट्रेस का संकेत दिखाते हैं। निवेशक शायद इस बात पर नज़र रखेंगे कि अलग-अलग बैंक अपने क्रेडिट कॉस्ट (Credit Costs) को कैसे मैनेज करते हैं, जो फिलहाल शेड्यूलड कमर्शियल बैंकों के लिए 0.31% पर सीमित है। क्या वे बढ़ती ब्याज दरों और वैश्विक व्यापार में संभावित रुकावटों के बीच इन स्तरों को बनाए रख पाएंगे, यह देखना अहम होगा।

इसके अलावा, एक्सपेक्टेड क्रेडिट लॉस (Expected Credit Loss) नॉर्म्स में आने वाला बदलाव - जो एक ज़्यादा प्रोएक्टिव अकाउंटिंग तरीका है और बैंकों को नुकसान होने से पहले उसका अनुमान लगाकर प्रोविजन करने की ज़रूरत होती है - भविष्य की प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) और प्रोविजनिंग (Provisioning) की ज़रूरतों को प्रभावित कर सकता है। बैंकों के लिए यह सबसे ज़रूरी होगा कि वे अपने लोन बुक (Loan Book) को बढ़ाते हुए इन नए स्लिपेज को कंट्रोल में रखें, ताकि वे इस फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) के बाकी हिस्से में अपनी एसेट क्वालिटी परफॉर्मेंस बनाए रख सकें।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.