जुलाई-सितंबर तिमाही में भारतीय बैंकों ने जबरदस्त डिपॉजिट ग्रोथ दर्ज की है। इसका बड़ा श्रेय RBI की फॉरेन करेंसी स्वैप फैसिलिटी को जाता है, जो 31 अगस्त को बंद हो गई है। निवेशकों की नजर अब इस बात पर है कि क्या बैंक इस मोमेंटम को बनाए रख पाएंगे या फंडिंग कॉस्ट बढ़ने से मार्जिन पर असर पड़ेगा।
स्वैप विंडो से मिला सहारा
RBI की ओर से दी गई कंसेशनल FCNR(B) स्वैप फैसिलिटी, जो 31 अगस्त, 2026 को समाप्त हुई, बैंकों के लिए डिपॉजिट जुटाने का सबसे बड़ा जरिया बनी। इस विंडो के जरिए बैंकिंग सिस्टम में लगभग $136.4 बिलियन का विदेशी मुद्रा प्रवाह हुआ। RBI द्वारा करेंसी हेजिंग की लागत उठाने से बैंकों को फायदा हुआ, जिससे वे सामान्य से 150 से 200 बेसिस पॉइंट्स ज्यादा ब्याज दरें ऑफर कर पाए।
बैंकों का दम-खम
इस सुविधा का असर सरकारी और निजी, दोनों तरह के बैंकों की बैलेंस शीट पर दिखा:
- AU Small Finance Bank: डिपॉजिट में 28.6% का शानदार उछाल।
- Bank of India: 21.6% की ग्रोथ दर्ज की गई।
- Bank of Baroda: घरेलू डिपॉजिट में 17% की बढ़ोतरी देखी गई।
- Punjab National Bank: डिपॉजिट में 9.9% और एडवांसेज में 14.8% की मजबूत ग्रोथ रही।
आगे की चुनौतियां
अब जबकि स्वैप फैसिलिटी हट चुकी है, बैंकों के सामने नई चुनौती खड़ी है। बिना इस खास सपोर्ट के डिपॉजिट ग्रोथ को बरकरार रखना आसान नहीं होगा। यदि बैंक इसे मेंटेन नहीं कर पाए, तो उनके नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव बढ़ सकता है।
वर्तमान में क्रेडिट ग्रोथ, डिपॉजिट ग्रोथ के मुकाबले काफी तेज है। ऐसे में बैंकों को लिक्विडिटी बनाए रखने के लिए महंगे विकल्प जैसे कि होलसेल मार्केट बॉरोइंग या सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CD) का सहारा लेना पड़ सकता है, जो सीधे तौर पर उनकी प्रॉफिटेबिलिटी को प्रभावित करेगा। निवेशकों के लिए अब बैंकों के अगले तिमाही नतीजों में डिपॉजिट सस्टेनेबिलिटी और कॉस्ट ऑफ फंड्स पर मैनेजमेंट की कमेंट्री सबसे महत्वपूर्ण होगी।
