साल 2026 की पहली छमाही में RBI के नए नियमों के कारण भारतीय बैंकों को फॉरेक्स ट्रेडिंग में **$50 करोड़** का नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि, बाद में बाजार में सुधार के साथ **$40 करोड़** की रिकवरी दर्ज की गई है, जो बैंकों के मुनाफे पर असर डाल सकती है।
साल 2026 की पहली छमाही भारतीय बैंकिंग सेक्टर के लिए काफी चुनौतीपूर्ण रही, खासकर उनके फॉरेक्स ट्रेडिंग पोर्टफोलियो के मोर्चे पर। 27 मार्च, 2026 को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने एक निर्देश जारी किया, जिसमें बैंकों के लिए ऑनशोर रुपया नेट ओपन पोजीशन की सीमा $10 करोड़ तय कर दी गई। इस अचानक आए नियम के कारण बैंकों को 10 अप्रैल की डेडलाइन तक अपने पोर्टफोलियो को तेजी से एडजस्ट करना पड़ा।
ट्रेडिंग बुक्स पर भारी असर
इस जल्दबाजी के फैसले ने बैंकों को मुश्किल स्थिति में डाल दिया। Crisil Coalition Greenwich के आंकड़ों के अनुसार, हाई वोलेटिलिटी और कॉर्पोरेट डिमांड के बीच पोजीशन खाली करते समय बैंकों को $50 करोड़ का मार्क-टू-मार्केट नुकसान उठाना पड़ा। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि यह नुकसान बैंकों की 'नॉन-इंटरेस्ट इनकम' में अस्थायी गिरावट के रूप में झलकता है, जो ट्रेडिंग गतिविधियों से आती है।
रिकवरी और मार्केट का तालमेल
शुरुआती झटके के बाद, मार्केट में स्थिति सामान्य होने लगी। जैसे ही डीलर्स ने नई बैलेंस शीट कैपेसिटी के हिसाब से अपनी स्ट्रैटेजी बदली, मार्केट स्प्रेड्स में बढ़त देखी गई। इस बदलाव ने बैंकों को एक बफर दिया, जिससे वे शुरुआती नुकसान का लगभग $40 करोड़ हिस्सा रिकवर करने में कामयाब रहे। 20 अप्रैल, 2026 को केंद्रीय बैंक ने कुछ संबंधित-पक्ष ट्रांजेक्शनों (related-party transactions) में छूट देकर बैंकों की ऑपरेशनल टेंशन को काफी हद तक कम कर दिया।
आगे की राह और रिस्क
निवेशकों के लिए यह घटना एक बड़ा सबक है कि कैसे सरकारी नियम सीधे तौर पर बैंक की प्रॉफिटेबिलिटी को प्रभावित करते हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए 85% कच्चे तेल और 50% प्राकृतिक गैस का आयात करता है, जिससे ट्रेड डेफिसिट और रुपये की स्थिरता हमेशा रडार पर रहती है। इसके अलावा, सितंबर 2026 से बैंकों को ओपन फॉरेक्स और गोल्ड पोजीशन पर 9% का कैपिटल चार्ज भी रखना अनिवार्य है। आने वाले क्वार्टरली नतीजों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बैंक इन अनुपालन खर्चों (compliance costs) को कितनी कुशलता से संभालते हैं।
