नंवबर 2026 में लिक्विडिटी की होड़ के बीच Punjab National Bank, Canara Bank और Axis Bank जैसे बड़े बैंकों ने फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) दरों में इजाफा कर दिया है। RBI द्वारा रेपो रेट को **5.50%** तक बढ़ाने के बाद डिपॉजिट जुटाने की इस जंग का सीधा असर बैंकों के मुनाफे पर पड़ सकता है।
नवंबर 2026 की शुरुआत के साथ ही भारतीय बैंकों ने अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) दरों को ऊपर की तरफ संशोधित करना शुरू कर दिया है। लिक्विडिटी जुटाने की इस रेस में सरकारी और प्राइवेट सेक्टर के दिग्गज खिलाड़ी जैसे Punjab National Bank, Canara Bank और Axis Bank शामिल हैं। यह बदलाव उन रिटेल और बल्क डिपॉजिटर्स के लिए है जो बेहतर रिटर्न की तलाश में हैं।\n\nयह कदम Reserve Bank of India (RBI) के उस फैसले के बाद आया है, जिसमें अक्टूबर 2026 में रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाकर 5.50% कर दिया गया था। बाजार में निवेश के कई अन्य विकल्प मौजूद होने के कारण, बैंकों पर डिपॉजिट खींचने का दबाव लगातार बढ़ रहा है।\n\n### बैंक प्रॉफिटेबिलिटी और मार्जिन पर असर\n\nबैंकों के लिए यह रेट हाइक दोधारी तलवार है। जब बैंक डिपॉजिट पर ज्यादा ब्याज देते हैं, तो उनका 'कॉस्ट ऑफ फंड्स' बढ़ जाता है। यदि बैंक इन बढ़ी हुई लागतों को लोन की दरों के जरिए ग्राहकों पर नहीं डाल पाते हैं, तो उनके नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर भारी दबाव आता है। सितंबर 2026 की तिमाही में कई प्राइवेट बैंकों ने पहले ही मार्जिन पर दबाव की बात स्वीकार की थी, और अब बाजार की नजर इस बात पर है कि क्या बैंक ग्रोथ और मुनाफे के बीच संतुलन बना पाएंगे।\n\n### डिपॉजिट जुटाने की नई स्ट्रैटेजी\n\nबैंक अब अपनी फंडिंग को स्थिर करने के लिए नए-नए तरीके अपना रहे हैं। Canara Bank और PNB जैसे बैंक 444-दिन या 555-दिन जैसी स्पेशल टेन्योर स्कीम्स पेश कर रहे हैं, जो सामान्य से ज्यादा ब्याज दे रही हैं। वहीं, Axis Bank जैसे संस्थान ₹3 करोड़ से ज्यादा के बल्क डिपॉजिट के लिए वॉल्यूम-आधारित प्राइसिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह कदम RBI के अक्टूबर 2026 में लागू नए डिपॉजिट नॉर्म्स के अनुरूप है, जो बल्क दरों में अधिक पारदर्शिता की मांग करते हैं।\n\n### निवेशकों को क्या देखना चाहिए?\n\nबैंकिंग सेक्टर के लिए सबसे बड़ी चुनौती एसेट-लायबिलिटी प्रोफाइल को मैनेज करना है। यदि डिपॉजिट ग्रोथ की रफ्तार क्रेडिट ग्रोथ से धीमी रहती है, तो बैंकों को लंबे समय तक ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ सकती हैं। निवेशकों को आने वाली तिमाही नतीजों में NIM और लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो पर खास नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही तय करेगा कि बैंक इस चुनौतीपूर्ण दौर में अपनी ग्रोथ को कैसे बरकरार रखते हैं।
