भारतीय बैंकिंग सेक्टर में एक दिलचस्प जंग छिड़ी है। जहां प्राइवेट बैंक प्रति कर्मचारी **₹19 करोड़** का बिजनेस कर रहे हैं, वहीं सरकारी बैंक (PSBs) तकनीकी दक्षता (Technical Efficiency) में बाजी मार रहे हैं। क्रेडिट और डिपॉजिट ग्रोथ का बढ़ता अंतर निवेशकों के लिए चिंता का सबब बना हुआ है।
भारतीय बैंकिंग का ढांचा इस समय एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की नई रिपोर्ट के अनुसार, फाइनेंशियल ईयर 2026 में पब्लिक सेक्टर बैंकों ने 93.12% का टेक्निकल एफिशिएंसी स्कोर हासिल किया है, जबकि प्राइवेट बैंक 86.02% पर ही रहे।
प्रोडक्टिविटी और कर्मचारियों की स्थिति
बिजनेस वॉल्यूम के मामले में प्राइवेट सेक्टर अभी भी आगे है। प्राइवेट बैंक प्रति कर्मचारी ₹19 करोड़ का बिजनेस जनरेट कर रहे हैं, जबकि सरकारी बैंकों का आंकड़ा ₹17 करोड़ है। फॉरेन बैंक ₹43 करोड़ के साथ इस दौड़ में सबसे आगे हैं। अपनी दक्षता बनाए रखने के लिए HDFC Bank, ICICI Bank और Axis Bank जैसे बड़े लेंडर्स ने टेक्नोलॉजी पर जोर दिया है, जिसके चलते फाइनेंशियल ईयर 2026 में 13,000 से अधिक पदों में कटौती देखी गई है।
हालांकि, डिजिटल एफिशिएंसी की इस होड़ में एक बड़ा रिस्क 'एट्रीशन' (Attrition) का है। प्राइवेट बैंकों में कर्मचारियों के छोड़ने की दर 18% से 25% के बीच है, जिससे संस्थागत अनुभव (Institutional Knowledge) का नुकसान होने का खतरा बना रहता है।
मार्जिन पर दबाव और फंडिंग की चुनौती
बैंकिंग सेक्टर के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्रेडिट और डिपॉजिट ग्रोथ के बीच का बढ़ता अंतर है। जुलाई 2026 तक, बैंकिंग सेक्टर की क्रेडिट ग्रोथ 19.3% पहुंच गई है, जबकि डिपॉजिट ग्रोथ केवल 15.4% रही। जब कर्ज की मांग जमा राशि से ज्यादा तेजी से बढ़ती है, तो बैंकों को महंगे विकल्पों की तरफ जाना पड़ता है, जिससे सीधा असर उनके नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर पड़ता है।
फाइव-डे वर्क वीक की डिबेट
बैंकिंग कामकाज पर एक और बादल 'फाइव-डे वर्क वीक' की मांग का है। बैंक यूनियन इसे कर्मचारियों के तनाव को कम करने के लिए जरूरी मान रहे हैं, लेकिन इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स को सर्विस डिलीवरी पर असर का डर है। अभी 99.8% ट्रांजैक्शन डिजिटल होने के बावजूद, ब्रांचों की पहुंच अभी भी पेंशनर्स और ग्रामीण ग्राहकों के लिए अनिवार्य है। निवेशकों को बैंक कमेटी के आगामी निर्णयों पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि ब्रांच एक्सेसिबिलिटी में कोई भी बड़ा बदलाव ऑपरेशनल कॉस्ट को प्रभावित कर सकता है।
