भारतीय बैंकों ने अपनी क्रेडिट कार्ड स्ट्रैटेजी में बड़ा बदलाव किया है। अब नए ग्राहक बनाने की दौड़ की बजाय, बैंक अपने मौजूदा ग्राहकों को एक से ज्यादा क्रेडिट कार्ड जारी करने पर ज़ोर दे रहे हैं। मार्च 2026 तक, देश में **10.7 करोड़** एक्टिव क्रेडिट कार्ड हैं, लेकिन इन्हें इस्तेमाल करने वाले यूनिक यूजर्स की संख्या सिर्फ **5.2 करोड़** है।
मल्टी-कार्डिंग का बढ़ता चलन
'बियॉन्ड द स्वाइप' (Beyond the Swipe) नाम की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक दशक में क्रेडिट कार्ड रखने वाले लोगों की संख्या के मुकाबले कुल एक्टिव कार्ड्स की ग्रोथ काफी तेज़ रही है। मार्च 2016 से मार्च 2026 के बीच, कुल एक्टिव कार्ड्स 5.1 गुना बढ़कर 2.1 करोड़ से 10.7 करोड़ हो गए। वहीं, यूनिक कार्डहोल्डर्स की संख्या सिर्फ 3.6 गुना बढ़ी, जो 1.4 करोड़ से 5.2 करोड़ तक पहुंची।
यह दिखाता है कि अब लगभग 22% क्रेडिट कार्ड यूजर्स के पास तीन या उससे ज़्यादा कार्ड हैं, जबकि दस साल पहले यह आंकड़ा सिर्फ 12% था।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
यह ट्रेंड बैंकों के लिए ट्रांजेक्शन वॉल्यूम और फी इनकम बढ़ाने में मददगार है। लेकिन, इसके साथ क्रेडिट रिस्क (Credit Risk) भी बढ़ सकता है। अगर लोग अपनी क्षमता से ज़्यादा कर्ज ले लेते हैं, तो यह बैंकों के लिए एक बड़ी समस्या बन सकती है, खासकर जब इकोनॉमिक मंदी का दौर आता है।
क्रेडिट पेनिट्रेशन और भविष्य
इन सबके बावजूद, भारत में क्रेडिट कार्ड का पेनिट्रेशन (Penetration) अभी भी 25% ही है, जो यूके (70%) और हांगकांग (98%) जैसे देशों के मुकाबले काफी कम है।
बाजार में एक और बड़ा बदलाव दिख रहा है। मार्च 2026 तक, फर्स्ट टाइम क्रेडिट कार्ड लेने वाले लगभग 50% लोग Gen Z (30 साल या उससे कम उम्र के) हैं। इनमें से 46% सेमी-अर्बन और रूरल एरिया से हैं। इससे साफ है कि बैंकों का फोकस अभी बड़े शहरों पर है, लेकिन ग्रामीण और छोटे शहरों में ग्रोथ की अपार संभावनाएं हैं।
बैंकिंग और कंज्यूमर फाइनेंस सेक्टर पर नज़र रखने वाले निवेशकों को इन ट्रेंड्स पर ध्यान देना चाहिए। मौजूदा ग्राहकों पर फोकस करने से कस्टमर एक्विजिशन कॉस्ट (Customer Acquisition Cost) कम होती है, लेकिन यह रणनीति कितनी सफल होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि लोग कितने कार्ड्स को सफलतापूर्वक मैनेज कर पाते हैं।
