Indian Banks Pivot: माइक्रो-लोन से बैंकों ने बनाई दूरी, MFIs को मिल रहा भारी फंड

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AuthorMehul Desai|Published at:
Indian Banks Pivot: माइक्रो-लोन से बैंकों ने बनाई दूरी, MFIs को मिल रहा भारी फंड

भारतीय बैंकों ने सीधे तौर पर दिए जाने वाले माइक्रो-लोन में **28.5%** की बड़ी कटौती की है। अब बैंक अपना ध्यान सीधे कर्ज देने के बजाय NBFC-MFIs को फंडिंग देने पर लगा रहे हैं, जिसमें पहली तिमाही में **91.4%** का उछाल आया है।

भारत के बैंकिंग सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। बैंक अब छोटे-छोटे व्यक्तिगत कर्ज देने के झंझट से बचते हुए होलसेल लेंडिंग की तरफ बढ़ रहे हैं। 30 जून 2026 तक के आंकड़ों पर गौर करें तो बैंकों का डायरेक्ट माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो सालाना आधार पर 28.5% घटकर ₹83,080 करोड़ रह गया है, जो पिछले साल ₹1.16 लाख करोड़ था।

ऑपरेशनल खर्च कम करने की रणनीति

बैंकों के लिए हजारों छोटे खातों को मैनेज करना काफी खर्चीला और मुश्किल होता है। अब वे यह जिम्मेदारी NBFC-MFIs पर छोड़ रहे हैं। इससे बैंकों का ऑपरेशनल बोझ कम हुआ है और वे इन संपत्तियों को अपने बड़े रिटेल लोन बुक में दिखा रहे हैं।

होलसेल लेंडिंग का बढ़ता क्रेज

बैंक माइक्रोफाइनेंस सेक्टर से बाहर नहीं हुए हैं, बल्कि उन्होंने अपना तरीका बदल लिया है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में इन संस्थाओं ने बैंकों से ₹21,407 करोड़ का फ्रेश कर्ज लिया है, जो पिछले साल के मुकाबले 91.4% ज्यादा है। आज पूरी NBFC-MFI इंडस्ट्री की कुल उधारी का लगभग 65% हिस्सा बैंकों के जरिए ही आता है।

क्या बदल रहा है आम आदमी के लिए?

इंडस्ट्री में एक्टिव लोन अकाउंट्स की संख्या 12.5 करोड़ से घटकर 9.9 करोड़ पर आ गई है। हालांकि, प्रति अकाउंट लोन साइज 27.8% बढ़कर ₹37,584 हो गया है। इसका मतलब साफ है कि अब वित्तीय संस्थान छोटे कर्जदारों के बजाय थोड़े बड़े और सुरक्षित कर्जदारों को प्राथमिकता दे रहे हैं। छोटे और जरूरतमंद परिवारों के लिए अब क्रेडिट पाना और कठिन हो सकता है।

सिस्टम में जोखिम

यह मॉडल बाजार में एकाधिकार का जोखिम भी पैदा करता है। केवल 12 बड़े खिलाड़ी कुल डेट फंडिंग के 98% हिस्से पर काबिज हैं। यदि इनमें से किसी भी संस्था के सामने लिक्विडिटी या ऑपरेशनल संकट आता है, तो ग्रासरूट लेवल पर क्रेडिट फ्लो बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। निवेशकों को अब Reserve Bank of India (RBI) के नए नियमों और रूरल इकॉनमी में क्रेडिट ग्रोथ के आंकड़ों पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.