भारतीय बैंकिंग सेक्टर में कर्ज देने के ट्रेंड में बड़ा बदलाव आ रहा है। अब बैंक पारंपरिक उद्योगों के बजाय AI, सेमीकंडक्टर और ग्रीन एनर्जी सेक्टर पर दांव लगा रहे हैं, जिसका कुल क्रेडिट पाइपलाइन **₹16.24 लाख करोड़** तक पहुंच गया है।
भारतीय बैंक अब अपनी लोन बुक को एक नई दिशा दे रहे हैं। अब पैसा पुरानी मैन्युफैक्चरिंग के बजाय नई तकनीक जैसे कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर असेंबली और डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
नई टेक्नोलॉजी, नए रिस्क
भारत के 'आत्मनिर्भर' विजन के चलते लिथियम-आयन और सोडियम-आयन बैटरी जैसे क्षेत्रों में भारी कैपिटल खर्च की जरूरत है। बैंकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती प्रोजेक्ट की लंबी अवधि और लोन रिपेमेंट के बीच तालमेल बिठाना है। सेमीकंडक्टर जैसे प्रोजेक्ट्स को ब्रेक-ईवन तक पहुंचने में अक्सर 5 से 10 साल का लंबा वक्त लग जाता है, जबकि सामान्य कमर्शियल लोन छोटे समय के लिए होते हैं। इसके अलावा, AI सेक्टर में तकनीक के तेजी से बदलने (हर 18 से 24 महीने में अपग्रेड) से बैंकों के लिए एसेट क्वालिटी का रिस्क भी बढ़ गया है।
कैसे बदल रही है बैंकिंग स्ट्रैटेजी?
बैंक अब 'माइलस्टोन-लिंक्ड डिस्बर्समेंट' (Milestone-linked disbursement) मॉडल पर जोर दे रहे हैं, ताकि पैसा तभी जारी हो जब प्रोजेक्ट्स तय लक्ष्य पूरे करें। साथ ही, इक्विपमेंट लीजिंग और ग्रीन-एनर्जी स्पेसिफिक लोन फैसिलिटी भी पेश की जा रही है।
ग्रीन एनर्जी का बड़ा मौका
भारत का रिन्यूएबल एनर्जी टारगेट 500 GW (2030 तक) है, जबकि मौजूदा क्षमता 288.6 GW है। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और बैटरी स्टोरेज मार्केट का आकार दशक के अंत तक $113 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। निवेशकों के लिए अब बैंकों की मैनेजमेंट कमेंट्री पर नजर रखना जरूरी है, ताकि यह समझा जा सके कि कौन से बैंक इन हाई-ग्रोथ सेक्टर में रिस्क को बेहतर ढंग से मैनेज कर रहे हैं और कौन अभी भी पारंपरिक सुरक्षित लेंडिंग पर टिके हैं।
