भारतीय बैंक अब बड़ी कंपनियों को डॉलर में कर्ज लेने का सस्ता तरीका सिखा रहे हैं। कंपनियां भारत में ही रुपये के बॉन्ड जारी कर रही हैं और करेंसी स्वैप के जरिए उसे डॉलर में बदल रही हैं। इससे लागत तो घट रही है, लेकिन निवेशकों के लिए मुनाफे में अस्थिरता का जोखिम बढ़ सकता है।
भारतीय बैंक आजकल बड़ी कंपनियों को डॉलर में पूंजी जुटाने का एक नया और असरदार रास्ता दिखा रहे हैं। इस रणनीति के तहत कंपनियां सीधे विदेशी बाजार से महंगा कर्ज लेने के बजाय, पहले भारत के घरेलू बाजार में रुपये में बॉन्ड जारी करती हैं। इसके तुरंत बाद, वे एक 'क्रॉस-करेंसी स्वैप' (Cross-Currency Swap) का इस्तेमाल करती हैं, जिससे यह रुपये वाला लोन डॉलर की देनदारी में बदल जाता है। इस तरह एक 'सिंथेटिक डॉलर लोन' तैयार हो जाता है, जो विदेशी बाजार के झमेलों और ऊंचे खर्चों से राहत दिलाता है।
यह रणनीति कैसे काम करती है?
इस पूरी प्रक्रिया का आधार घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ब्याज दरों का अंतर है। बैंक इस समय 2026 की लिक्विडिटी और बाजार में उपलब्ध फॉरवर्ड प्रीमियम का फायदा उठा रहे हैं। जून 2026 में Reserve Bank of India द्वारा लाई गई डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा ने बैंकों का काम और आसान कर दिया है, हालांकि यह सुविधा 31 दिसंबर 2026 को खत्म हो जाएगी।
निवेशकों के लिए चेतावनी (Warning)
दिखने में यह सस्ता जरूर है, लेकिन इसमें वित्तीय जोखिम छिपे हैं। ये क्रॉस-करेंसी स्वैप बेहद जटिल डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंट्स हैं। अगर कोई कंपनी 'हेज अकाउंटिंग' के कड़े नियमों में फिट नहीं बैठती, तो उसे हर तिमाही अपने प्रॉफिट-एंड-लॉस स्टेटमेंट में इन स्वैप की 'मार्क-टू-मार्केट' वैल्यू दिखानी होगी। इसका मतलब है कि भले ही कंपनी का बिजनेस अच्छा चल रहा हो, लेकिन करेंसी और ब्याज दरों में मामूली हलचल से कंपनी के तिमाही मुनाफे में भारी उतार-चढ़ाव आ सकता है।
किसके लिए है सही?
यह रणनीति मुख्य रूप से उन कंपनियों के लिए बेहतर है जिनका 'नेचुरल हेज' मजबूत है, जैसे बड़ी IT कंपनियां या बड़े एक्सपोर्टर्स, जिनकी कमाई पहले से ही डॉलर में होती है। बाकी कंपनियों के लिए यह विदेशी मुद्रा की अस्थिरता का बड़ा रिस्क हो सकता है। शेयरधारकों को सलाह है कि वे कंपनी की उन रिपोर्ट्स पर नजर रखें जहां डेरिवेटिव के इस्तेमाल और हेज अकाउंटिंग का जिक्र होता है, ताकि मुनाफे पर पड़ने वाले असर को समझा जा सके।
