RP-Sanjiv Goenka Group के Shashwat Goenka ने भारतीय बैंकों को अपनी रणनीति बदलने की सलाह दी है। उन्होंने कंपनियों को Fortune Global 500 में शामिल करने के लिए शॉर्ट-टर्म के बजाय लॉन्ग-टर्म 'पेशेंट कैपिटल' (Patient Capital) उपलब्ध कराने पर जोर दिया है।
भारत के आर्थिक विकास में बैंकिंग सेक्टर की भूमिका अहम है, लेकिन ग्लोबल स्तर पर अपनी जगह बनाने के लिए बैंकों को अपनी पुरानी लेंडिंग मॉडल में बदलाव करना होगा। Shashwat Goenka का मानना है कि यदि भारत की 50 कंपनियां Fortune Global 500 लिस्ट में जगह बनाना चाहती हैं, तो बैंकों को पारंपरिक 5 साल के लोन स्ट्रक्चर से बाहर निकलकर 20 साल तक के 'पेशेंट कैपिटल' (Patient Capital) पर ध्यान देना होगा।
क्यों जरूरी है बड़ा बदलाव?
वर्तमान में भारतीय बैंकों का कॉर्पोरेट फंडिंग में दबदबा है और वे हर एक रुपये में से 62 पैसे खुद देते हैं। लेकिन रिन्यूएबल एनर्जी, मैन्युफैक्चरिंग और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स ऐसे हैं, जिनमें निवेश तो भारी होता है लेकिन मुनाफा आने में लंबा समय लगता है। अगर बैंक शॉर्ट-टर्म डिपॉजिट के जरिए लॉन्ग-टर्म लोन देंगे, तो इससे 'एसेट-लायबिलिटी मिसमैच' का बड़ा जोखिम पैदा हो सकता है, जो निवेशकों के लिए चिंता का विषय है।
बैंकिंग सेक्टर की मजबूती और चुनौतियां
राहत की बात यह है कि भारतीय बैंकिंग सेक्टर फिलहाल काफी मजबूत स्थिति में है। बैंकों का ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) गिरकर 1.8% पर आ गया है, जो कई दशकों का निचला स्तर है। यह लचीलापन बैंकों को नए और जटिल लेंडिंग मॉडल आजमाने का मौका देता है। हालांकि, लंबी अवधि का कर्ज बांटते समय डिपॉजिटर्स के पैसों की सुरक्षा और गवर्नेंस (Governance) को प्राथमिकता देना अनिवार्य होगा।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
आने वाले समय में बैंक अपने फंडिंग सोर्स को कितना डाइवर्सिफाई करते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। साथ ही, कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट का विकास इस बोझ को साझा करने में अहम भूमिका निभा सकता है। निवेशकों को बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ, मैनेजमेंट कमेंट्री और एसेट क्वालिटी पर कड़ी नजर रखनी चाहिए ताकि वे समझ सकें कि बैंक इस नई दौड़ के लिए कितने तैयार हैं।
