भारतीय बैंकों के 'लोन बूम' पर मंडराए खतरे के बादल, 'लिक्विडिटी' की बढ़ी चिंता

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारतीय बैंकों के 'लोन बूम' पर मंडराए खतरे के बादल, 'लिक्विडिटी' की बढ़ी चिंता
Overview

भारतीय बैंकों के लिए एक तरफ जहां इस फाइनेंशियल ईयर (FY) में कॉर्पोरेट लोन की डिमांडज़बरदस्त डबल-डिजिट ग्रोथ दिखा रही है, वहीं दूसरी तरफ पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) बैंकों के सामने 'लिक्विडिटी' की एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। State Bank of India (SBI) और Bank of Baroda (BoB) जैसी बड़ी बैंकों के पास लेंडिंग का बड़ा पाइपलाइन है, लेकिन PSU बैंक इस ग्रोथ को फंड करने के लिए अपनी लिक्विडिटी कवरेज रेश्यो (LCR) का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे आगे उनकी लेंडिंग क्षमता सीमित हो सकती है।

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कॉर्पोरेट लोन डिमांड में तूफानी तेज़ी

रिन्यूएबल एनर्जी और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे अहम सेक्टरों से कॉर्पोरेट लोन की ज़बरदस्त डिमांड देखने को मिल रही है। इससे State Bank of India (SBI), Bank of Baroda (BoB) और Axis Bank जैसे बैंकों के लिए अच्छी ग्रोथ की उम्मीद जगी है। इन बैंकों के पास बड़े पैमाने पर लेंडिंग पाइपलाइन तैयार है, जिसे लोन में बदलने के लिए वे तैयार हैं। हालांकि, यही आक्रामक लेंडिंग उनकी 'लिक्विडिटी' बफर पर दबाव बना रही है, खासकर पब्लिक सेक्टर बैंकों के लिए। यह स्थिति भविष्य में ग्रोथ और प्रॉफिटेबिलिटी बनाए रखने के लिए एक बड़ी चुनौती पैदा कर सकती है।

SBI, BoB, Axis Bank का लेंडिंग आउटलुक

देश की सबसे बड़ी कॉर्पोरेट लेंडर State Bank of India (SBI) का अनुमान है कि FY27 में क्रेडिट ग्रोथ 13% से 15% के बीच रहेगी, जिसके लिए ₹5.5 लाख करोड़ की कॉर्पोरेट लोन पाइपलाइन तैयार है। SBI के चेयरमैन CS Setty ने बताया कि इंफ्रास्ट्रक्चर, रिन्यूएबल एनर्जी और ऑटो मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स से अच्छी डिमांड आ रही है। मार्च 2026 क्वार्टर तक SBI की कॉर्पोरेट लोन बुक सालाना 15% बढ़कर ₹14.24 लाख करोड़ हो गई थी। Bank of Baroda ₹50,000 करोड़ की पाइपलाइन के सहारे 10% कॉर्पोरेट लोन ग्रोथ का लक्ष्य लेकर चल रहा है, जिसमें रिन्यूएबल एनर्जी और डेटा सेंटर्स से भारी डिमांड है। प्राइवेट सेक्टर के लीडिंग लेंडर Axis Bank ने मार्च 2026 तक अपनी कॉर्पोरेट बुक में सालाना 38% की ज़बरदस्त ग्रोथ दर्ज की, जो बढ़कर ₹4.13 लाख करोड़ हो गई। मई 2026 तक SBI की मार्केट कैपिटलाइजेशन करीब ₹9.9 ट्रिलियन थी, जिसका पी/ई रेश्यो लगभग 11.21 था। वहीं, Bank of Baroda की मार्केट कैप ₹1.34 ट्रिलियन रही और पी/ई रेश्यो करीब 6.79, जो इसे एक वैल्यू स्टॉक बनाता है। Axis Bank की मार्केट कैप लगभग ₹3.9 ट्रिलियन के आसपास थी और यह करीब 14.96 के पी/ई पर ट्रेड कर रहा था।

'लिक्विडिटी' का पेच

एक बड़ी चिंता यह है कि क्या पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) बैंक इस लोन एक्सपेंशन को बनाए रख पाएंगे। Macquarie Capital Securities की चेतावनी है कि मौजूदा लिक्विडिटी कवरेज रेश्यो (LCR) लेवल लोन ग्रोथ के लिए बहुत कम गुंजाइश छोड़ रहे हैं, जब तक कि डिपॉजिट्स में समानुपातिक वृद्धि न हो। ऐसा लगता है कि PSU बैंक मजबूत डिपॉजिट जुटाने की क्षमता के बजाय आसानी से उपलब्ध 'लिक्विडिटी' के ज़रिए मार्केट शेयर हासिल कर रहे हैं। स्थिर डिपॉजिट बेस के बजाय 'लिक्विडिटी' पर यह निर्भरता जल्द ही उनकी लेंडिंग क्षमता को सीमित कर सकती है।

सेक्टर-वाइड ट्रेंड्स और RBI की चिंता

पूरे सेक्टर में, FY26 में बैंक क्रेडिट ग्रोथ औसतन 16.1% रही, जो डिपॉजिट ग्रोथ 13.5% से काफी ज़्यादा है। इससे मार्च 2026 तक क्रेडिट-टू-डिपॉजिट रेश्यो बढ़कर 81.4% हो गया। बैंकों ने क्रेडिट ग्रोथ को फंड करने के लिए 'लिक्विडिटी' बफर कम किया है, जिससे LCRs में आमतौर पर गिरावट देखी गई है, हालांकि ज़्यादातर 100% के रेगुलेटरी मिनिमम से ऊपर बने हुए हैं। Axis Bank के LCR में मामूली वृद्धि हुई, वहीं HDFC Bank और Union Bank of India जैसे प्रमुख बैंकों में गिरावट देखी गई। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को भी मौजूदा टाइट 'लिक्विडिटी' स्थितियों के कारण बैंकों से रिवाइज्ड LCR नॉर्म्स के लागू होने में देरी के अनुरोध मिले हैं।

क्रेडिट ग्रोथ आउटलुक और बैंक स्टॉक परफॉर्मेंस

FY27 में कुल भारतीय बैंक क्रेडिट ग्रोथ 11% से 13% के दायरे में रहने का अनुमान है, लेकिन यह 12% से नीचे जाने की उम्मीद है। इस मॉडरेशन का कारण पश्चिम एशिया में जियोपॉलिटिकल टेंशन और बदलते इंटरेस्ट रेट्स हैं, जो कमजोर सेक्टर्स में डिफ़ॉल्ट बढ़ा सकते हैं। बैंक स्टॉक्स की बात करें तो, SBI का शेयर प्राइस मई 2026 की शुरुआत में Q4 अर्निंग्स में चूकने और मार्जिन कॉन्ट्रैक्शन के बाद दो दिनों में लगभग 11% गिर गया था। Bank of Baroda का स्टॉक प्रमुख मूविंग एवरेज से नीचे ट्रेड कर रहा है, जो कमजोर बुलिश मोमेंटम का संकेत देता है। एनालिस्ट्स Axis Bank को फेयरली वैल्यूड मानते हैं, जबकि BoB को वैल्यू स्टॉक माना जा रहा है। SBI का पी/ई रेश्यो इसके मीडियन के करीब है, हालांकि कुछ विश्लेषण इसे मामूली रूप से ओवरवैल्यूड बताते हैं।

PSU बैंकों के लिए सस्टेनेबिलिटी रिस्क

सबसे बड़ा जोखिम 'लिक्विडिटी' टाइट होने के बीच PSU बैंकों के लिए लेंडिंग ग्रोथ की सस्टेनेबिलिटी है। क्रेडिट और डिपॉजिट ग्रोथ के बीच लगातार असंतुलन बैंकों को महंगे होलसेल फंडिंग की ओर धकेल सकता है, जिससे नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) कम हो सकते हैं। SBI के Q4 FY26 नतीजों में यह ट्रेंड दिखा, जिसमें मार्जिन कॉन्ट्रैक्शन और ऑपरेटिंग प्रॉफिट में गिरावट आई। PSU बैंकों को प्राइवेट सेक्टर के साथियों की तुलना में कम लागत वाले डिपॉजिट जुटाने में ज़्यादा चुनौती का सामना करना पड़ता है, जिनके पास आम तौर पर मजबूत डिपॉजिट फ्रेंचाइज़ी होती है। 'लिक्विडिटी' की कमी होने पर यह अंतर कॉम्पिटिटिव डिसएडवांटेज पैदा कर सकता है। इसके अलावा, LCR गाइडलाइंस में प्रस्तावित बदलावों से कुल रिपोर्टेड LCR कम हो सकता है, जिससे बैंकों को अपनी क्रेडिट और डिपॉजिट ग्रोथ स्ट्रेटेजी पर फिर से विचार करना होगा।

भविष्य की राह

हालांकि भारत की आर्थिक ग्रोथ के चलते कॉर्पोरेट क्रेडिट की डिमांड मजबूत बनी हुई है, लेकिन 'लिक्विडिटी' और मार्जिन प्रेशर के कारण PSU बैंकों के लिए आगे की राह चुनौतीपूर्ण है। बैंकों को भविष्य में क्रेडिट ग्रोथ को सस्टेनेबली फंड करने के लिए डिपॉजिट जुटाने को प्राथमिकता देनी होगी, जिससे संभवतः फंडिंग कॉस्ट बढ़ सकती है। FY27 के लिए क्रेडिट ग्रोथ में अनुमानित मंदी, डिपॉजिट्स के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा के साथ मिलकर, यह संकेत देती है कि प्रॉफिटेबिलिटी पर दबाव पड़ सकता है, खासकर उन बैंकों के लिए जो होलसेल फंडिंग पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं और जिनके LCRs में गिरावट आ रही है।

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