Indian Banks: आफत में बैंक! 83% के पार पहुंचा Credit-Deposit Ratio, फंडिंग की बड़ी टेंशन

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AuthorAditya Rao|Published at:
Indian Banks: आफत में बैंक! 83% के पार पहुंचा Credit-Deposit Ratio, फंडिंग की बड़ी टेंशन
Overview

Indian banks के सामने एक बड़ी फंडिंग चुनौती आ गई है। लोन (Credit Growth) की रफ्तार जमा (Deposits) के मुकाबले कहीं ज़्यादा तेज़ हो गई है, जिसके चलते Credit-Deposit Ratio 15 मार्च तक रिकॉर्ड **83.04%** पर पहुंच गया है।

जमा के मुकाबले लोन की बढ़ती मांग: बैंकों पर दबाव

मार्च 15 तक, सालाना डिपॉजिट ग्रोथ मात्र 10.8% रही, जो कि लोन (Advances) में 13.8% की वृद्धि के मुकाबले काफी कम है। इस असंतुलन ने क्रेडिट-डिपॉजिट (CD) रेशियो को रिकॉर्ड 83.04% तक पहुंचा दिया है। हाल के हफ्तों में यह गैप काफी चौड़ा हुआ है, जो बैंकों द्वारा लोन देने के लिए फंड जुटाने के तरीके में एक बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है। लोन की मांग को पूरा करने के लिए, बैंक अब महंगे व्होलसेल फंडिंग जैसे सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CDs) पर ज्यादा निर्भर हो रहे हैं। पिछले एक साल में CDs में 29% की भारी बढ़ोतरी हुई है, और अब ये कुल डिपॉजिट का 2.6% हिस्सा बन गई हैं, जो पिछले 10 सालों का सबसे ऊंचा स्तर है। यह महंगे फंड्स पर निर्भरता बैंकिंग सिस्टम पर दबाव डाल रही है।

लिक्विडिटी और प्रॉफिटेबिलिटी पर चिंताएं बढ़ीं

इस ऊंचे CD Ratio का सीधा असर बैंकों की लिक्विडिटी (liquidity) पर पड़ता है। कम बफर के साथ, बैंकों के पास अप्रत्याशित कैश की ज़रूरत या बाजार में उतार-चढ़ाव से निपटने की क्षमता कम हो जाती है। एनालिस्ट्स का मानना ​​है कि यह स्थिति नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM), जो बैंकों के मुनाफे का मुख्य पैमाना है, की रिकवरी में देरी कर सकती है। भले ही लोन की ग्रोथ अच्छी है, लेकिन महंगे फंड्स के बढ़ते इस्तेमाल से मार्जिन पर दबाव आ रहा है। कुछ अनुमानों के मुताबिक, NIM रिकवरी FY26 के अंत या FY27 की शुरुआत तक टल सकती है।

वैश्विक तुलना और RBI की भूमिका

वैश्विक स्तर पर क्रेडिट-टू-डिपॉजिट रेशियो में काफी भिन्नता देखी जाती है। भारत का वर्तमान रिकॉर्ड स्तर ऊंचा है, लेकिन जिस तेजी से यह बढ़ा है, वह एक चिंता का विषय है और टाइट फंडिंग एनवायरनमेंट (tight funding environment) की ओर इशारा करता है। घरेलू फंडिंग के दबाव के साथ-साथ, पश्चिमी एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) भी बैंकिंग सेक्टर के लिए जोखिम पैदा कर रहे हैं। इस संकट के कारण मार्च के मध्य तक लगभग $6 बिलियन का फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर (FPI) आउटफ्लो देखा गया है। बढ़ती क्रूड ऑयल की कीमतें भी चिंताएं बढ़ा रही हैं। इन सबके बीच, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) इस CD Ratio पर कड़ी नजर रखे हुए है और बैंकिंग स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए तैयार है। 1 अप्रैल, 2026 से लागू होने वाले नए लिक्विडिटी कवरेज रेशियो (LCR) नियम भी बैंकों की डिपॉजिट स्ट्रेटेजी को प्रभावित कर सकते हैं।

एनालिस्ट्स के विचार

एनालिस्ट्स भी तत्काल दबाव को स्वीकार कर रहे हैं। Nomura ने धीमी डिपॉजिट ग्रोथ से मार्जिन में कमी की चेतावनी दी है। वहीं, Moody's Ratings का आउटलुक स्थिर बना हुआ है, और वे FY26-27 में डिपॉजिट के अनुरूप लोन ग्रोथ की उम्मीद कर रहे हैं। India Ratings and Research का मानना ​​है कि अगर ब्याज दरें घटती हैं तो FY26-27 में बैंकों की प्रॉफिटेबिलिटी और मार्जिन में सुधार हो सकता है। अंततः, बैंकों को अपने मार्जिन या लिक्विडिटी से समझौता किए बिना लोन बुक को फंड करने के लिए स्थिर, कम लागत वाले डिपॉजिट आकर्षित करने होंगे।

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