FCNR Deposits: भारतीय बैंकों पर बढ़ा इंश्योरेंस प्रीमियम का बोझ, 2026-27 तक पहुंचेगा ₹11.49 बिलियन

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AuthorNeha Patil|Published at:
FCNR Deposits: भारतीय बैंकों पर बढ़ा इंश्योरेंस प्रीमियम का बोझ, 2026-27 तक पहुंचेगा ₹11.49 बिलियन

FCNR डिपॉजिट्स में भारी उछाल के बाद भारतीय बैंकों के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। RBI की जून 2026 की स्पेशल विंडो के बाद इन डिपॉजिट्स पर मैंडेटरी इंश्योरेंस प्रीमियम का खर्च बढ़कर **₹11.49 बिलियन** तक पहुंचने का अनुमान है।

बढ़ता वित्तीय बोझ

जून 2026 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा FCNR (B) डिपॉजिट विंडो और USD/INR स्वैप फैसिलिटी शुरू किए जाने के बाद से विदेशी मुद्रा का इनफ्लो काफी बढ़ा है। इसके चलते बैंकों को डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (DICGC) को भारी प्रीमियम चुकाना पड़ रहा है, जिसका सीधा असर बैंकों के बॉटम लाइन पर दिख रहा है।

इंश्योरेंस का पेचीदा गणित

मौजूदा नियमों के तहत DICGC केवल ₹5 लाख तक के डिपॉजिट पर ही सुरक्षा की गारंटी देता है, जो मुख्य रूप से आम रिटेल ग्राहकों के लिए है। लेकिन FCNR अकाउंट्स अक्सर हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNI) द्वारा रखे जाते हैं, जिनके लिए ₹5 लाख का कवर न के बराबर है। विशेषज्ञों का मानना है कि बैंक ऐसे अकाउंट्स पर मोटा प्रीमियम दे रहे हैं, जिन्हें इस सुरक्षा की वास्तविक जरूरत नहीं है, जिससे कैपिटल का एलोकेशन इनएफिशिएंट हो रहा है।

करेंसी रिस्क और भविष्य की राह

करेंसी की वोलेटिलिटी ने इस जोखिम को और बढ़ा दिया है। USD/INR एक्सचेंज रेट में बदलाव सीधे तौर पर डिपॉजिट की वैल्यू और प्रीमियम लागत को प्रभावित करते हैं। बैंकों के लिए यह और मुश्किल इसलिए है क्योंकि ये डिपॉजिट 3 से 5 साल के लिए लॉक होते हैं।

फिलहाल रेगुलेटर्स और नीति निर्माता इस ढांचे में बदलाव पर विचार कर रहे हैं। चर्चा है कि DICGC प्रीमियम को उसी फॉरेन करेंसी में वसूला जाए ताकि नेचुरल हेजिंग हो सके, या फिर केवल इंश्योर्ड अमाउंट पर ही प्रीमियम कैलकुलेट किया जाए। निवेशकों के लिए अब DICGC एक्ट 1961 में किसी भी संभावित बदलाव पर नजर रखना जरूरी है, क्योंकि यह सीधे तौर पर बैंकों की प्रॉफिटेबिलिटी तय करेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.