वित्तीय वर्ष 2026 (FY26) में भारतीय वित्तीय क्षेत्र में एक बड़ा अंतर साफ देखने को मिला। पारंपरिक बैंकों को डिपॉजिट (Deposits) के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margins) पर भारी दबाव आया। इसके विपरीत, नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज़ (NBFCs) और फिनटेक फर्मों ने मजबूत ग्रोथ दर्ज की। यह बदलाव इसलिए हुआ क्योंकि कंपनियों ने नई स्ट्रैटेजी अपनाईं और तेजी से डिजिटल टूल्स (Digital Tools) का इस्तेमाल किया। कई बैंकों के मार्जिन गिरे क्योंकि उन्हें फंड्स बनाए रखने के लिए डिपॉजिट पर इंटरेस्ट रेट (Interest Rates) बढ़ाने पड़े। वहीं NBFCs ने अपनी फ्लेक्सिबल और स्पेशलाइज्ड लेंडिंग मेथड्स (Specialized Lending Methods) से अपनी सर्विसज़ का विस्तार किया।
FY26 में भारतीय वित्तीय क्षेत्र ने एक बड़ा बदलाव देखा, जो सिर्फ बड़े प्राइवेट बैंकों पर निर्भर रहने के बजाय पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSUs), NBFCs और फिनटेक कंपनियों की अगुवाई में आगे बढ़ा। Motilal Oswal Financial Services के अनुसार, पूरे वित्तीय क्षेत्र का मार्केट वैल्यू (Market Value) 18% बढ़कर ₹108 लाख करोड़ हो गया, लेकिन इस वृद्धि का बड़ा श्रेय PSUs, NBFCs और फिनटेक को मिला जिन्होंने मार्केट शेयर (Market Share) हासिल किया। इसके उलट, बड़े प्राइवेट बैंकों के स्टॉक प्राइस (Stock Prices) में लगातार प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव और धीमी लोन ग्रोथ (Loan Growth) के चलते 10% से 18% तक की गिरावट देखी गई। PSUs ने अधिक स्थिर ट्रेंड दिखाया है, एनालिस्ट्स (Analysts) के मुताबिक FY26 से FY28 तक उनकी सालाना कमाई में औसतन 15.2% की ग्रोथ का अनुमान है, जो बेहतर एसेट क्वालिटी (Asset Quality) के कारण है। NBFCs बैंकों की छूटी हुई जगहों को भर रही हैं, वे ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी, तेज लोन अप्रूवल (Loan Approvals) और आसान पेपरवर्क देती हैं, अक्सर छोटे और मध्यम व्यवसायों और ऐसे ग्राहकों को टारगेट करती हैं जिन्हें विशेष सेवाओं की जरूरत होती है। उनके टोटल एसेट्स (Total Assets) में काफी बढ़ोतरी हुई है और रिटेल लेंडिंग (Retail Lending) में उनका हिस्सा लगातार बढ़ रहा है।
इस ओवरऑल ग्रोथ के बावजूद, पारंपरिक बैंकिंग में कुछ कमजोरियां बनी हुई हैं। बैंकों को सस्ते CASA डिपॉजिट (CASA Deposits) के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण अपने प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव झेलना पड़ सकता है, जिससे उन्हें फिक्स्ड डिपॉजिट (Fixed Deposit) पर ज्यादा रेट देने पड़ सकते हैं। इसके साथ ही, रेगुलेटरी (Regulatory) कोशिशें जो असुरक्षित कर्ज (Unsecured Lending) में जोखिमों को कंट्रोल करने के लिए की जा रही हैं, उन्होंने कई बड़े प्राइवेट बैंकों की लोन ग्रोथ और प्रॉफिट फोरकास्ट (Profit Forecasts) को धीमा कर दिया है। हालांकि NBFCs फ्लेक्सिबल हैं, लेकिन मार्केट लोन पर उनकी निर्भरता फंडिग कॉस्ट (Funding Costs) बढ़ा सकती है और अस्थिर मार्केट में कैश फ्लो (Cash Flow) के लिए जोखिम पैदा कर सकती है, जो पिछली मंदी में भी दिखा था। यह सेक्टर बड़े आर्थिक झटकों के प्रति भी संवेदनशील है। उदाहरण के लिए, वैश्विक संघर्षों के कारण बढ़ती तेल की कीमतें महंगाई बढ़ा सकती हैं, आयात-निर्यात के गैप को बढ़ा सकती हैं और आर्थिक ग्रोथ व बॉन्ड यील्ड्स (Bond Yields) को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे बैंक के प्रॉफिट मार्जिन कम हो सकते हैं और बैड लोंस (NPAs) का जोखिम बढ़ सकता है। एक छिपा हुआ जोखिम भी है क्योंकि हाल के रिफॉर्म्स (Reforms) को आर्थिक मंदी के दौरान पूरी तरह परखा नहीं गया है।
आने वाले समय के लिए अनुमान है कि वित्तीय क्षेत्र में धीरे-धीरे प्रॉफिट में सुधार होगा, अनुमान है कि FY26 से FY28 तक पूरे सेक्टर के लिए 16-18% का सालाना ग्रोथ रेट (CAGR) देखने को मिल सकता है। इस रिकवरी (Recovery) में बेहतर एसेट क्वालिटी, स्थिर प्रॉफिट मार्जिन और खास तौर पर एसेट-बैक्ड लोंस (Asset-Backed Loans) व कुछ कॉर्पोरेट बोरिंग (Corporate Borrowing) में क्रेडिट ग्रोथ (Credit Growth) बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि बड़े प्राइवेट बैंकों को FY27 से बेहतर स्टॉक परफॉरमेंस (Stock Performance) देखने को मिल सकती है क्योंकि उनके प्रॉफिट तेजी से बढ़ेंगे, लेकिन यह ट्रेंड जारी रहने की संभावना है कि सफलता सिर्फ स्थापित बैंकों तक सीमित न रहे। लगातार डिजिटलाइजेशन, स्पेशलाइज्ड फाइनेंसियल प्लेटफॉर्म्स (Specialized Financial Platforms) का उदय और PSUs के अंदरूनी स्ट्रैटेजी बदलाव जो इंटरनेशनल रीच (International Reach) और फोकस्ड सर्विसज़ (Focused Services) का लक्ष्य रखते हैं, वे इस सेक्टर के भविष्य को आकार देंगे। निवेशकों को इस बदलते वित्तीय बाजार में नेविगेट (Navigate) करने के लिए सावधानी से स्टॉक चुनने और अपने निवेश को एडजस्ट (Adjust) करने की आवश्यकता होगी।