भारतीय बैंकों ने **$127 अरब** से अधिक का ओवरसीज डिपॉजिट जुटाया है, लेकिन लागत बचाने के चक्कर में कई बैंक भविष्य के ब्याज भुगतान को 'अनहेज़्ड' (Unhedged) रख रहे हैं। अगर रुपया गिरता है, तो बैंकों को बड़ा नुकसान हो सकता है।
RBI द्वारा जून 2026 में पेश की गई स्पेशल स्वैप फैसिलिटी के बाद भारतीय बैंकों ने करीब $127.23 अरब के फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (FCNR-B) डिपॉजिट जुटाए हैं। हालांकि इसने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती दी है, लेकिन इन डिपॉजिट्स पर होने वाले ब्याज भुगतान का एक बड़ा हिस्सा 'अनहेज़्ड' है, जो बैंकिंग सेक्टर के लिए एक नई चुनौती बनकर उभरा है।
हेजिंग कॉस्ट बनाम करेंसी रिस्क
केंद्रीय बैंक ने मुख्य राशि (Principal Amount) के लिए रुपये की गिरावट के जोखिम से सुरक्षा दी है, लेकिन ब्याज भुगतान पर यह कवर नहीं मिलता। इंडस्ट्री के डेटा के अनुसार, 3 से 5 साल की अवधि के लिए ब्याज लागत को हेज करने पर लगभग 3% का वार्षिक प्रीमियम देना पड़ता है। लागत बचाने के लिए पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर के कई बैंकों के ट्रेजरी डेस्क ने इस हेजिंग को नजरअंदाज कर दिया है। वे एक तरह से इस भरोसे पर काम कर रहे हैं कि रुपया स्थिर रहेगा।
बैंक प्रॉफिटेबिलिटी पर असर
फिलहाल, हेजिंग न करने से बैंक अपनी शॉर्ट-टर्म मार्जिन को बेहतर बनाए हुए हैं। लेकिन यह रणनीति पूरी तरह से रुपये की स्थिरता पर टिकी है। अगर ग्लोबल लेवल पर क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल आता है या अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों के चलते रुपये में तेज गिरावट आती है, तो बैंकों को डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा। इससे बैंकों के नेट प्रॉफिट पर भारी दबाव आने की आशंका है।
सिस्टमिक रिस्क और बाजार का दबाव
अगर एक साथ कई बैंक रुपये की कमजोरी के दौरान डॉलर की मांग करते हैं, तो इससे रुपये पर और भी दबाव बढ़ सकता है, जो देश के बैलेंस ऑफ पेमेंट को प्रभावित करेगा। बाजार के जानकारों की नजर अब इस बात पर है कि बैंक आने वाली तिमाहियों में इन लायबिलिटीज को कैसे मैनेज करते हैं, क्योंकि क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतें कभी भी बैंकों को अपनी हेजिंग पॉलिसी पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकती हैं।
