भारतीय बैंकों में क्रेडिट ग्रोथ **18.1%** के मजबूत स्तर पर है, लेकिन कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और खराब मानसून बैंकिंग सेक्टर के लिए नई चुनौतियां लेकर आए हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा रेपो रेट में की गई **25 बेसिस पॉइंट्स** की बढ़ोतरी के बाद निवेशक अब बैंकों की एसेट क्वालिटी पर पैनी नजर रख रहे हैं।
भारतीय बैंकिंग सेक्टर इस वक्त एक जटिल स्थिति का सामना कर रहा है। एक तरफ क्रेडिट डिमांड में जबरदस्त उछाल है, तो दूसरी तरफ मैक्रो-इकोनॉमिक दबाव सेक्टर की मजबूती को परख रहे हैं। अक्टूबर 2026 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाकर 5.5% कर दिया, जिसने बैंकिंग आउटलुक को सतर्क बना दिया है।
क्रेडिट ग्रोथ और चुनौतियां
बैंकों का क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो सुधरकर 80.8% हो गया है, जो जून के 83.4% के मुकाबले बेहतर है। इसका मतलब है कि सिस्टम में पर्याप्त लिक्विडिटी है। हालांकि, 360 ONE Capital के जानकारों ने आगाह किया है कि बाहरी कारक कर्जदारों की सेहत पर असर डाल सकते हैं। क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतें महंगाई बढ़ा रही हैं, जिससे लोगों की डिस्पोजेबल इनकम घट रही है। इसके अलावा, पांच राज्यों में सूखे जैसे हालात रूरल इकोनॉमी के लिए खतरा हैं, जिससे एग्रीकल्चरल लोन में डिफॉल्ट बढ़ सकते हैं।
मार्जिन पर दबाव (Margin Squeeze)
बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव साफ दिख रहा है। हालांकि FCNR-B डिपॉजिट से लिक्विडिटी में मदद मिली है, लेकिन फंडिंग कॉस्ट बढ़ने से मार्जिन में 10-20 बेसिस पॉइंट्स की कमी आ सकती है। अब बैंकों को मार्जिन बढ़ाने के बजाय वॉल्यूम-ड्रिवेन ग्रोथ पर निर्भर रहना होगा।
निवेशकों की राय
बाजार फिलहाल लार्ज-कैप प्राइवेट सेक्टर बैंकों को पसंद कर रहा है, क्योंकि इनकी बैलेंस शीट मजबूत है। आने वाले महीनों में निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि बैंक अपने लोन बुक की क्वालिटी, खासकर रूरल और स्मॉल-बिजनेस सेगमेंट में, कैसे बनाए रखते हैं।
