Indian Banks: डिपॉजिट से तेज भाग रहा है क्रेडिट, बैंकों की लिक्विडिटी पर बढ़ा दबाव

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Indian Banks: डिपॉजिट से तेज भाग रहा है क्रेडिट, बैंकों की लिक्विडिटी पर बढ़ा दबाव

भारतीय बैंकों में क्रेडिट ग्रोथ **18%** के मुकाबले डिपॉजिट ग्रोथ महज **12%** दर्ज की गई है, जिससे क्रेडिट-टू-डिपॉजिट रेशियो **85%** तक पहुंच गया है। हालांकि Q1 FY27 में बैंकों का नेट प्रॉफिट **16%** बढ़ा है, लेकिन फंडिंग असंतुलन और बढ़ते खर्च निवेशकों के लिए चिंता का विषय हैं।

भारतीय बैंक इस समय एक चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं जहां वे डिपॉजिट जुटाने के मुकाबले कर्ज तेजी से बांट रहे हैं। फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली तिमाही में कुल एडवांस में 18% की सालाना बढ़ोतरी हुई, जबकि डिपॉजिट मोबिलाइजेशन 12% पर ही सुस्त रहा। इस असंतुलन ने इंडस्ट्री के क्रेडिट-टू-डिपॉजिट रेशियो को 85% के स्तर पर ला खड़ा किया है। जब यह रेशियो इतना ऊंचा होता है, तो बैंकों के पास बिना नए डिपॉजिट जुटाए आक्रामक तरीके से कर्ज देने की गुंजाइश कम हो जाती है।

मुनाफे और ऑपरेशनल चुनौतियां

फंडिंग गैप के बावजूद बैंकों ने प्रॉफिट मार्जिन को दुरुस्त रखा है। तिमाही के दौरान नेट प्रॉफिट में 16% का उछाल देखा गया। बैंकों ने मार्च 2026 के बाद से लोन पर इंटरेस्ट रेट 13 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाए, जबकि डिपॉजिट पर मिलने वाले ब्याज में 8 बेसिस पॉइंट्स की कटौती की। इसके अलावा, क्रेडिट कॉस्ट यानी बैड लोन के लिए रखा जाने वाला पैसा 31 बेसिस पॉइंट्स घटकर 0.3% रह गया, जिसने नॉन-इंटरेस्ट इनकम में आई 13% की गिरावट की भरपाई की। हालांकि, बैंकों की कार्यक्षमता पर दबाव है; कॉस्ट-टू-इनकम रेशियो 54 बेसिस पॉइंट्स बढ़कर 47% हो गया है, जो बताता है कि ऑपरेशनल खर्च, फीस-आधारित इनकम से ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं।

AI का बढ़ा क्रेज और गवर्नेंस की कमी

बैंकिंग सेक्टर में आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस (AI) का बोलबाला है और 86% बैंक अब AI टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो साल 2024 के मुकाबले 9 गुना ज्यादा है। तेजी के बावजूद इंटरनल निगरानी कमजोर है। केवल एक-तिहाई बैंकों के पास AI प्रोजेक्ट्स के लिए बोर्ड-लेवल सुपरविजन है और 20% से कम बैंक ही रियल-टाइम मॉनिटरिंग कर रहे हैं। Reserve Bank of India (RBI) के नए मॉडल रिस्क मैनेजमेंट फ्रेमवर्क के बाद, अब बैंकों पर रेगुलेटरी मानकों को पूरा करने का भारी दबाव है।

लिक्विडिटी और भविष्य के जोखिम

अच्छी खबर यह है कि सिस्टम की लिक्विडिटी ₹9.7 लाख करोड़ के चार साल के उच्चतम स्तर पर है, जिसे $127.2 बिलियन के विदेशी मुद्रा प्रवाह का सहारा मिला है। हालांकि, लंबी अवधि के जोखिम बने हुए हैं। बैंकों को साल 2029 से 2031 के बीच कर्ज भुगतान के दबाव का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, वेस्ट एशिया में जारी भू-राजनीतिक अस्थिरता भारत के ट्रेड फ्लो को प्रभावित कर सकती है, जिससे MSMEs की लोन चुकाने की क्षमता पर असर पड़ने का खतरा है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.