बल्क फंडिंग पर निर्भरता का बढ़ता चलन
भारतीय बैंकों के लिए फंड जुटाने का तरीका बदल रहा है। क्रेडिट की तेज ग्रोथ को बनाए रखने के लिए बैंक अब बड़े टिकट वाले बल्क फंडिंग की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के वित्तीय वर्ष 2026 के आंकड़ों के अनुसार, ₹5 करोड़ और उससे ऊपर के डिपॉजिट्स अब कुल टर्म देनदारियों का 34.8% हो गए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि कुल टर्म डिपॉजिट खातों की संख्या में यह हिस्सा सिर्फ 0.05% है। वहीं, छोटे रिटेल डिपॉजिट्स (₹5 लाख और उससे कम) का हिस्सा घटकर सिर्फ 17.8% रह गया है। यह दिखाता है कि बैंकिंग सिस्टम अब पारंपरिक बचत के बजाय कॉर्पोरेट और संस्थागत कैश मैनेजमेंट पर ज्यादा निर्भर हो गया है।
मार्जिन पर दबाव और फंड की बढ़ती लागत
ज्यादा लागत वाले इन बल्क डिपॉजिट्स पर निर्भरता बैंकों की प्रॉफिटेबिलिटी को लगातार कम कर रही है। जैसे-जैसे क्रेडिट ग्रोथ डिपॉजिट ग्रोथ से आगे निकल रही है, और क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो 83% के करीब पहुंच गया है, बैंकों को ऊंचे रेट पर फंड जुटाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। हालांकि कुछ बैंकों ने मार्जिन बचाने के लिए नए डिपॉजिट्स पर रेट घटाने की कोशिश की है, लेकिन इसका असर सीमित रहा है। पुरानी ऊंची दरों पर लिए गए डिपॉजिट्स अभी भी सिस्टम में बने हुए हैं, और फंड की कुल लागत अभी भी ज्यादा बनी हुई है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि आसान मार्जिन बढ़ाने का दौर खत्म हो गया है। ऐसे में, जब क्रेडिट की मांग मजबूत बनी हुई है लेकिन सस्ते CASA डिपॉजिट्स मिलना मुश्किल हो रहा है, तो नेट इंटरेस्ट मार्जिन में और गिरावट देखने को मिल सकती है।
जोखिमों का विश्लेषण (Forensic Bear Case)
रिस्क मैनेजमेंट के नजरिए से देखें तो, डिपॉजिट की यह मौजूदा संरचना बैंकों के लिए बड़े खतरे पैदा कर रही है। RBI के अधिकारी कई बार चेतावनी दे चुके हैं कि बल्क फंड (जैसे सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट) पर अत्यधिक निर्भरता बैंकों को रोलओवर रिस्क और सिस्टमैटिक अस्थिरता के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकती है, खासकर आर्थिक तनाव के समय में। रिटेल सेविंग्स के विपरीत, बल्क डिपॉजिट मार्केट के उतार-चढ़ाव और ब्याज दरों के बदलावों के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। अगर लिक्विडिटी टाइट होती है या मार्केट सेंटिमेंट खराब होता है, तो ये केंद्रित देनदारियां एसेट-लायबिलिटी मिसमैच का कारण बन सकती हैं। इसके अलावा, रिटेल ग्रोथ की कमी को छिपाने के लिए बल्क फंड का आक्रामक पीछा करना एक डिफेंसिव रणनीति है जो लंबे समय तक टिक नहीं सकती। जो संस्थान अपनी फंडिंग का विस्तार नहीं करते या नए रिटेल सेगमेंट तक पहुंचने के लिए इनोवेशन नहीं करते, उन्हें क्रेडिट साइकिल के ठंडा पड़ने पर भारी कमाई के नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
भविष्य का दृष्टिकोण
आगे चलकर, यह सेक्टर Expected Credit Loss (ECL) जैसे कड़े नियमों के लागू होने की तैयारी कर रहा है। नेट इंटरेस्ट मार्जिन में संभावित गिरावट की भरपाई के लिए बैंक लगातार वेल्थ मैनेजमेंट जैसे नए आय स्रोतों की तलाश कर रहे हैं। हालांकि इंडस्ट्री की कैपिटल पोजीशन मजबूत है और एसेट क्वालिटी अच्छी बनी हुई है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती क्रेडिट देने की जरूरत और लागत-प्रभावी, टिकाऊ रिटेल डिपॉजिट जुटाने के बीच संतुलन बनाना है। यह ऐसे समय में हो रहा है जब अर्थव्यवस्था में निवेशक नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स की ओर बढ़ रहे हैं।
