'फंडिंग वॉर' ने बढ़ाई बैंकों की मुश्किल!
मौजूदा ब्याज दर कटौती के दौर में भारतीय बैंकों को नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) में जितनी गहराई तक गिरावट का सामना करना पड़ रहा है, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। यह स्थिति COVID-19 महामारी से पहले की ब्याज दर कटौती की तुलना में कहीं ज्यादा गंभीर है। विश्लेषण से पता चलता है कि टॉप बैंकों के NIM में औसतन 154 बेसिस पॉइंट (bps) की कमी आई है, जबकि करीब छह साल पहले यह गिरावट सिर्फ 40 bps थी। यह अंतर न सिर्फ ब्याज दरों में कटौती की गहराई को दिखाता है, बल्कि बैंकिंग सेक्टर के फंड जुटाने और कीमत तय करने के तरीकों में आए संरचनात्मक बदलावों को भी उजागर करता है।
डिपॉजिट्स के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा और लागत
वर्तमान परिदृश्य में एक बड़ी चुनौती है डिपॉजिट्स (Deposits) के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा। इस वजह से बैंकों के लिए फंड जुटाने की लागत (Cost of funds) में काफी बढ़ोतरी हुई है। 2025 में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (Scheduled Commercial Banks) की औसत डिपॉजिट कॉस्ट 5% से ऊपर चली गई, जो 2024 में 4.7% थी। यह लागत में बढ़ोतरी ऐसे समय में हो रही है जब RBI की नीतिगत दरें घटने के कारण लोन की दरें, खासकर एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR) से जुड़ी दरें, कम हो रही हैं। यानी, बैंकों की आय (Asset yields) घट रही है।
इसके अलावा, पब्लिक का फिक्स्ड डिपॉजिट्स (Fixed Deposits) पर भरोसा कम हुआ है। 2012 में जहां घरों की कुल पूंजी का 58% फिक्स्ड डिपॉजिट्स में लगता था, वहीं FY25 तक यह घटकर 35% रह गया है। लोग बेहतर रिटर्न की तलाश में कहीं और निवेश कर रहे हैं। इसके चलते, बैंक अपनी फंडिंग की जरूरतें पूरी करने के लिए कम लागत वाले करेंट अकाउंट सेविंग अकाउंट (CASA) डिपॉजिट्स की जगह महंगे बल्क डिपॉजिट्स (Bulk Deposits) और सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट्स (CDs) का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे मार्जिन पर और भी ज्यादा दबाव पड़ रहा है।
पब्लिक और प्राइवेट बैंकों में अंतर
यह मार्जिन संकुचन (Margin Compression) सभी बैंकों पर एक जैसा नहीं है। जिन पब्लिक सेक्टर बैंकों का विश्लेषण किया गया, उनमें इस बार मार्जिन में ज्यादा गिरावट देखी गई। वहीं, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda) ने तो COVID-19 के शुरुआती दौर की दर कटौती के दौरान अपने मार्जिन में वृद्धि भी दर्ज की थी।
निजी बैंकों की बात करें तो, कोटक महिंद्रा बैंक (Kotak Mahindra Bank) का मार्जिन इस चक्र में 43 bps गिरा है, जबकि 2020 में यह सिर्फ 20 bps गिरा था। एक्सिस बैंक (Axis Bank) में 33 bps की कमी आई, जबकि पहले इसमें कोई गिरावट नहीं आई थी। HDFC Bank इस मामले में एक अपवाद रहा, जिसके NIM में इस चक्र में केवल 11 bps की गिरावट आई, जबकि पिछली बार यह 20 bps था। हालांकि, हालिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि Q3 FY25 (सितंबर तिमाही) में पब्लिक सेक्टर बैंकों के NIM में क्रमिक सुधार देखा गया, जबकि निजी बैंकों में गिरावट जारी रही। उदाहरण के लिए, SBI का फुल-बैंक NIM Q2 FY26 में लगभग 2.97% था, बैंक ऑफ बड़ौदा का 2.96%, और PNB का 2.72%। वहीं, एक्सिस बैंक ने 3.73% और कोटक महिंद्रा बैंक ने 4.54% रिपोर्ट किया, हालांकि कोटक के लिए यह पिछली तिमाही की तुलना में मामूली गिरावट थी।
वैल्यूएशन और भविष्य का अनुमान
फिलहाल, बैंकिंग सेक्टर का वैल्यूएशन मिला-जुला है। फरवरी 2026 तक, प्रमुख बैंकों के P/E रेश्यो (Price-to-Earnings Ratio) में बड़ा अंतर है। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (Union Bank of India) का 7.38x और पंजाब नेशनल बैंक (PNB) का 7.63x है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) का 13.13x के आसपास है, जबकि HDFC Bank का 18.39x और कोटक महिंद्रा बैंक का 22.64x तक है। यह दर्शाता है कि जहां कुछ पब्लिक सेक्टर बैंक आकर्षक वैल्यूएशन पर दिख रहे हैं, वहीं कोटक महिंद्रा जैसे निजी बैंक प्रीमियम पर हैं।
विश्लेषकों की राय बंटी हुई है। नोमुरा (Nomura) का मानना है कि NIM में गिरावट का यह दौर अब अपने निचले स्तर पर पहुँच गया है और डिपॉजिट री-प्राइसिंग (Deposit repricing) के कारण इसमें धीरे-धीरे सुधार आएगा। वहीं, CARE रेटिंग्स का अनुमान है कि NIM पर लगातार दबाव और बढ़ते क्रेडिट कॉस्ट (Credit Cost) की वजह से रिटर्न ऑन एसेट्स (RoTA) में 12-15 bps की गिरावट आकर यह लगभग 1.15% तक पहुँच सकता है। दिसंबर 2025 में हुई 25 bps की रेपो रेट कटौती का असर भी NIM पर दिखेगा, लेकिन डिपॉजिट कॉस्ट में पूरी तरह से इसका असर दिखने में कुछ समय लगेगा।
सबसे बड़ा जोखिम: फंडिंग पर निर्भरता
भारतीय बैंकों के लिए सबसे बड़ा जोखिम उनकी फंडिंग यानी पैसे जुटाने की क्षमता पर निर्भरता है। कई वैश्विक बैंकों के विपरीत, जो मार्केट फंडिंग का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, भारतीय बैंक अपनी देनदारियों (Liabilities) का एक बड़ा हिस्सा डिपॉजिट्स से ही पूरा करते हैं।
बेहतर यील्ड (Yield) की मांग के कारण डिपॉजिट्स के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा बैंकों को महंगा फंड जुटाने पर मजबूर कर रही है। यह लागत दबाव और गिरती लोन दरों का मेल बैंकों के लिए एक संरचनात्मक कमजोरी (Structural disadvantage) पैदा कर रहा है। बैंक एक तरह से 'दोनों तरफ से पिट' रहे हैं – वे अपनी उधार की लागत को पर्याप्त रूप से कम नहीं कर पा रहे, जबकि उन्हें लोन की दरें घटानी पड़ रही हैं। यह दोहरा दबाव, खासकर EBLR-लिंक्ड लोन्स पर, मुनाफे को पिछले चक्रों की तुलना में और अधिक समय तक कम कर सकता है।
इसके अलावा, घरों की बचत का इक्विटी और म्यूचुअल फंड्स की ओर बढ़ता झुकाव यह संकेत देता है कि भविष्य में स्थिर और कम लागत वाले रिटेल डिपॉजिट्स को आकर्षित करना एक बड़ी चुनौती होगी। इससे बैंकों को और भी महंगे बल्क डिपॉजिट्स पर निर्भर रहना पड़ सकता है। यह संरचनात्मक भेद्यता (Structural vulnerability) NIM रिकवरी की गति को धीमा कर सकती है, भले ही पॉलिसी रेट स्थिर हो जाएं या और गिरें।